अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुरुकुलनन्दन! उस समय कृतार्थ होकर उस शिष्यने वह ब्रह्मपद प्राप्त किया, जहाँ
जाकर शोक नहीं करना पड़ता ॥ ४४ ॥
अर्जुन उवाच
को न्वसौ ब्राह्मणः कृष्ण कश्च शिष्यो जनार्दन ।
श्रोतव्यं चेन्मयैतद् वै तत्त्वमाचक्ष्व मे विभो ॥ ४५ ॥
अर्जुनने पूछा—जनार्दन श्रीकृष्ण! वे ब्रह्मनिष्ठ गुरु कौन थे और शिष्य कौन थे?
प्रभो! यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो ठीक-ठीक बतानेकी कृपा कीजिये ॥ ४५ ॥
वासुदेव उवाच
अहं गुरुर्महाबाहो मनः शिष्यं च विद्धि मे ।
त्वत्प्रीतया गुह्यमेतच्च कथितं ते धनंजय ॥ ४६ ॥
श्रीकृष्णने कहा—महाबाहो! मैं ही गुरु हूँ और मेरे मनको ही शिष्य समझो। धनंजय!
तुम्हारे स्नेहवश मैंने इस गोपनीय रहस्यका वर्णन किया है ॥ ४६ ॥
मयि चेदस्ति ते प्रीतिर्नित्यं कुरुकुलोद्वह ।
अध्यात्ममेतच्छ्रुत्वा त्वं सम्यगाचर सुव्रत ॥ ४७ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुरुकुलनन्दन! यदि मुझपर तुम्हारा प्रेम हो तो इस
अध्यात्मज्ञानको सुनकर तुम नित्य इसका यथावत् पालन करो ॥ ४७ ॥
ततस्त्वं सम्यगाचीर्णे धर्मेऽस्मिन्नरिकर्षण ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो मोक्षं प्राप्स्यसि केवलम् ॥ ४८ ॥
शत्रुदमन! इस धर्मका पूर्णतया आचरण करनेपर तुम समस्त पापोंसे छूटकर विशुद्ध
मोक्षको प्राप्त कर लोगे ॥ ४८ ॥
पूर्वमप्येतदेवोक्तं युद्धकाल उपस्थिते ।
मया तव महाबाहो तस्मादत्र मनः कुरु ॥ ४९ ॥
महाबाहो! पहले भी मैंने युद्धकाल उपस्थित होनेपर यही उपदेश तुमको सुनाया था।
इसलिये तुम इसमें मन लगाओ ॥ ४९ ॥
मया तु भरतश्रेष्ठ चिरदृष्टः पिता प्रभुः ।
तमहं द्रष्टुमिच्छामि सम्मते तव फाल्गुन ॥ ५० ॥
भरतश्रेष्ठ अर्जुन! अब मैं पिताजीका दर्शन करना चाहता हूँ। उन्हें देखे बहुत दिन हो
गये। यदि तुम्हारी राय हो तो मैं उनके दर्शनके लिये द्वारका जाऊँ ॥ ५० ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तवचनं कृष्णं प्रत्युवाच धनंजयः ।
गच्छावो नगरं कृष्ण गजसाह्वयमद्य वै ॥ ५१ ॥