अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपृथ्वीके पाँच गुण समझने चाहिये। यह देवी स्थावर-जंगम प्राणियोंसे भरी हुई, समस्त
जीवोंको जन्म देनेवाली तथा शुभ और अशुभका निर्देश करनेवाली है ।। ३९ ।।
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
एते पञ्च गुणा भूमेर्विज्ञेया द्विजसत्तमाः ।। ४० ।।
विप्रवरो! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध—ये ही पृथ्वीके पाँच गुण जानने
चाहिये ।। ४० ।।
पार्थिवश्च सदा गन्धो गन्धश्च बहुधा स्मृतः ।
तस्य गन्धस्य वक्ष्यामि विस्तरेण बहून् गुणान् ।। ४१ ।।
इनमें भी गन्ध उसका खास गुण है। गन्ध अनेक प्रकारकी मानी गयी है। मैं उस
गन्धके गुणोंका विस्तारके साथ वर्णन करूँगा ।। ४१ ।।
इष्टश्चानिष्टगन्धश्च मधुरोऽम्लः कटुस्तथा ।
निर्हारी संहतः स्निग्धो रूक्षो विशद एव च ।। ४२ ।।
एवं दशविधो ज्ञेयः पार्थिवो गन्ध इत्युत ।
इष्ट (सुगन्ध), अनिष्ट (दुर्गन्ध), मधुर, अम्ल, कटु, निहारी (दूरतक फैलनेवाली),
मिश्रित, स्निग्ध, रूक्ष और विशद—ये पार्थिव गन्धके दस भेद समझने चाहिये ।। ४२ १/२ ।।
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं द्रवश्चाणां गुणाः स्मृताः ।। ४३ ।।
रसज्ञानं तु वक्ष्यामि रसस्तु बहुधा स्मृतः ।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस—ये जलके चार गुण माने गये हैं (इनमें रस ही जलका मुख्य
गुण है)। अब मैं रस-विज्ञानका वर्णन करता हूँ। रसके बहुत-से भेद बताये गये हैं ।। ४३ १/२
।।
मधुरोऽम्लः कटुस्तिक्तः कषायो लवणस्तथा ।। ४४ ।।
एवं षड्विधविस्तारो रसो वारिमयः स्मृतः ।
मीठा, खट्टा, कड़ुआ, तीता, कसैला और नमकीन—इस प्रकार छः भेदोंमें जलमय
रसका विस्तार बताया गया है ।। ४४ १/२ ।।
शब्दः स्पर्शस्तथा रूपं त्रिगुणं ज्योतिरुच्यते ।। ४५ ।।
ज्योतिषश्च गुणो रूपं रूपं च बहुधा स्मृतम् ।
शब्द, स्पर्श और रूप—ये तेजके तीन गुण कहे गये हैं। इनमें रूप ही तेजका मुख्य
गुण है। रूपके भी कई भेद माने गये हैं ।। ४५ १/२ ।।
शुक्लं कृष्णं तथा रक्तं नीलं पीतारुणं तथा ।। ४६ ।।
ह्रस्वं दीर्घं कृशं स्थूलं चतुरस्रं तु वृत्तवत् ।
एवं द्वादशविस्तारं तेजसो रूपमुच्यते ।। ४७ ।।
विज्ञेयं ब्राह्मणैर्वृद्धैर्धर्मज्ञैः सत्यवादिभिः ।