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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 421 में से

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पृष्ठ 161

द्विजवरो! इस अनुमान-प्रमाणके द्वारा इस बातको अच्छी तरह जानते हैं कि
अन्तर्यामी परमात्मा सत्त्वस्वरूप आत्मामें स्थित हैं। इस तत्त्वको समझे बिना परम पुरुषको
प्राप्त करना सम्भव नहीं है ।। ६ ।।
क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् ।
ज्ञानं त्यागोऽथ संन्यासः सात्त्विकं वृत्तमिष्यते ।। ७ ।।
क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, ज्ञान, त्याग तथा संन्यास—ये सात्त्विक
बर्ताव बताये गये हैं ।। ७ ।।
एतेनैवानुमानेन मन्यन्ते वै मनीषिणः ।
सत्त्वं च पुरुषश्चैव तत्र नास्ति विचारणा ।। ८ ।।
मनीषी पुरुष इसी अनुमानसे उस सत्त्वस्वरूप आत्माका और परमात्माका मनन करते
हैं। इसमें कोई विचारणीय बात नहीं है ।। ८ ।।
आहुरेके च विद्वांसो ये ज्ञानपरिनिष्ठिताः ।
क्षेत्रज्ञसत्त्वयोरैक्यमित्येतन्नोपपद्यते ।। ९ ।।
ज्ञानमें भलीभाँति स्थित कितने ही विद्वान् कहते हैं कि क्षेत्रज्ञ और सत्त्वकी एकता
युक्तिसंगत नहीं है ।। ९ ।।
पृथग्भूतं ततः सत्त्वमित्येतदविचारितम् ।
पृथग्भावश्च विज्ञेयः सहजश्चापि तत्त्वतः ।। १० ।।
उनका कहना है कि उस क्षेत्रज्ञसे सत्त्व पृथक् है, क्योंकि यह सत्त्व अविचारसिद्ध है। ये
दोनों एक साथ रहनेवाले होनेपर भी तत्त्वतः अलग-अलग हैं—ऐसा समझना
चाहिये ।। १० ।।
तथैकत्वनानात्वमिष्यते विदुषां नयः ।
मशकोदुम्बरे चैक्यं पृथक्त्वमपि दृश्यते ।। ११ ।।
इसी प्रकार दूसरे विद्वानोंका निर्णय दोनोंके एकत्व और नानात्वको स्वीकार करता है;
क्योंकि मशक और उदुम्बरकी एकता और पृथक्ता देखी जाती है ।। ११ ।।
मत्स्यो यथान्यः स्यादाप्सु सम्प्रयोगस्तथा तयोः ।
सम्बन्धस्तोयबिन्दूनां पर्णे कोकनदस्य च ।। १२ ।।
जैसे जलसे मछली भिन्न है तो भी मछली और जल—दोनोंका संयोग देखा जाता है
एवं जलकी बूँदोंका कमलके पत्तेसे सम्बन्ध देखा जाता है ।। १२ ।।
गुरुरुवाच
इत्युक्तवन्तस्ते विप्रास्तदा लोकपितामहम् ।
पुनः संशयमापन्नाः पप्रच्छुर्मुनिसत्तमाः ।। १३ ।।