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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 421 में से

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पृष्ठ 131

विद्वान् कूर्म इवाङ्गानि कामान् संहृत्य सर्वशः ।
विरजाः सर्वतो मुक्तो यो नरः स सुखी सदा ॥ ४६ ॥
जैसे कछुआ अपने अंगोंको सब ओरसे समेट लेता है, उसी प्रकार जो विद्वान् मनुष्य
अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको सब ओरसे संकुचित करके रजोगुणसे रहित हो जाता है, वह
सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त एवं सदाके लिये सुखी हो जाता है ॥ ४६ ॥
कामानात्मनि संयम्य क्षीणतृष्णः समाहितः ।
सर्वभूतसुहृन्मित्रो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ४७ ॥
जो कामनाओंको अपने भीतर लीन करके तृष्णासे रहित, एकाग्रचित तथा सम्पूर्ण
प्राणियोंका सुहृद् और मित्र होता है, वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है ॥ ४७ ॥
इन्द्रियाणां निरोधेन सर्वेषां विषयैषिणाम् ।
मुनेर्जनपदत्यागादध्यात्मग्निः समिध्यते ॥ ४८ ॥
विषयोंकी अभिलाषा रखनेवाली समस्त इन्द्रियोंको रोककर जनसमुदायके स्थानका
परित्याग करनेसे मुनिका अध्यात्मज्ञानरूपी तेज अधिक प्रकाशित होता है ॥ ४८ ॥
यथाग्निरिन्धनैर्ऋद्धो महाज्योतिः प्रकाशते ।
तथेन्द्रियनिरोधेन महानात्मा प्रकाशते ॥ ४९ ॥
जैसे ईंधन डालनेसे आग प्रज्वलित होकर अत्यन्त उद्दीप्त दिखायी देती है, उसी प्रकार
इन्द्रियोंका निरोध करनेसे परमात्माके प्रकाशका विशेष अनुभव होने लगता है ॥ ४९ ॥
यदा पश्यति भूतानि प्रसन्नात्माऽऽत्मनो हृदि ।
स्वयंज्योतिस्तदा सूक्ष्मात् सूक्ष्मं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ५० ॥
जिस समय योगी प्रसन्नचित्त होकर सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने अन्तःकरणमें स्थित
देखने लगता है, उस समय वह स्वयंज्योतिःस्वरूप होकर सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म सर्वोत्तम
परमात्माको प्राप्त होता है ॥ ५० ॥
अग्नी रूपं पयः स्रोतो वायुः स्पर्शनमेव च ।
मही पङ्कधरं घोरमाकाशश्रवणं तथा ॥ ५१ ॥
रोगशोकसमाविष्टं पञ्चस्रोतःसमावृतम्
पञ्चभूतसमायुक्तं नवद्वारं द्विदैवतम् ॥ ५२ ॥
रजस्वलमथादृश्यं त्रिगुणं च त्रिधातु कम् ।
संसर्गाभिरतं मूढं शरीरमिति धारणा ॥ ५३ ॥
अग्नि जिसका रूप है, रुधिर जिसका प्रवाह है, पवन जिसका स्पर्श है, पृथ्वी जिसमें
हाड़-मासं आदि कठोर रूपमें प्रकट है, आकाश जिसका कान है, जो रोग और शोकसे
चारों ओरसे घिरा हुआ है, जो पाँच प्रवाहोंसे आवृत है, जो पाँच भूतोंसे भलीभाँति युक्त है,
जिसके नौ द्वार हैं, जिसके दो (जीव और ईश्वर) देवता हैं, जो रजोगुणमय, अदृश्य
(नाशवान्), (सुख, दुःख और मोहरूप) तीन गुणोंसे तथा वात, पित्त और कफ—इन तीन