अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशैत्यात् प्रकुपितः काये तीव्रवायुसमीरितः ॥ २१ ॥
यः स पञ्चसु भूतेषु प्राणापाने व्यवस्थितः ।
स गच्छत्यूर्ध्वगो वायुः कृच्छ्रान्मुक्त्वा शरीरिणः ॥ २२ ॥
अन्य प्रकारकी तीव्र वायुसे प्रेरित हो शरीरमें सर्दीसे कुपित हुई जो वायु पाँचों भूतोंमें
प्राण और अपानके स्थानमें स्थित है, वही पञ्चभूतोंके संघातका नाश करती है तथा वह
देहधारियोंको बड़े कष्टसे त्यागकर ऊर्ध्वलोकको चली जाती है ॥ २१-२२ ॥
शरीरं च जहात्येवं निरुच्छ्वासश्च दृश्यते ।
स निरूष्मा निरुच्छ्वासो निःश्रीको हतचेतनः ॥ २३ ॥
ब्रह्मणा सम्परित्यक्तो मृत इत्युच्यते नरैः ।
इस प्रकार जब जीव शरीरका त्याग करता है, तब प्राणियोंका शरीर उच्छ्वासहीन
दिखायी देता है। उसमें गर्मी, उच्छ्वास, शोभा और चेतना कुछ भी नहीं रह जाती। इस
तरह जीवात्मासे परित्यक्त उस शरीरको लोग मृत (मरा हुआ) कहते हैं ॥ २३ १/२ ॥
स्रोतोभिर्यैर्विजानाति इन्द्रियार्थान् शरीरभृत् ॥ २४ ॥
तैरेव न विजानाति प्राणानाहारसम्भवान् ।
तत्रैव कुरुते काये यः स जीवः सनातनः ॥ २५ ॥
देहधारी जीव जिन इन्द्रियोंके द्वारा रूप, रस आदि विषयोंका अनुभव करता है, उनके
द्वारा वह भोजनसे परिपुष्ट होनेवाले प्राणोंको नहीं जान पाता। इस शरीरके भीतर रहकर
जो कार्य करता है, वह सनातन जीव है ॥ २४-२५ ॥
तथा यद्यद् भवेद् युक्तं संनिपाते क्वचित् क्वचित् ।
तत्तन्मर्म विजानीहि शास्त्रदृष्टं हि तत् तथा ॥ २६ ॥
कहीं-कहीं संधिस्थानोंमें जो-जो अंग संयुक्त होता है, उस-उसको तुम मर्म समझो;
क्योंकि शास्त्रमें मर्मस्थानका ऐसा ही लक्षण देखा गया है ॥ २६ ॥
तेषु मर्मसु भिन्नेषु ततः स समुदीरयन् ।
आविश्य हृदयं जन्तोः सत्त्वं चाशु रुणद्धि वै ॥ २७ ॥
उन मर्मस्थानों (संधियों)-के विलग होनेपर वायु ऊपरको उठती हुई प्राणीके हृदयमें
प्रविष्ट हो शीघ्र ही उसकी बुद्धिको अवरुद्ध कर लेती है ॥ २७ ॥
ततः सचेतनो जन्तुर्नाभिजानाति किंचन ।
तमसा संवृतज्ञानः संवृतेष्वेव मर्मसु ।
स जीवो निरधिष्ठानश्चाल्यते मातरिश्वना ॥ २८ ॥
तब अन्तकाल उपस्थित होनेपर प्राणी सचेतन होनेपर भी कुछ समझ नहीं पाता;
क्योंकि तम (अविद्या)-के द्वारा उसकी ज्ञानशक्ति आवृत्त हो जाती है। मर्मस्थान भी अवरुद्ध
हो जाते हैं। उस समय जीवके लिये कोई आधार नहीं रह जाता और वायु उसे अपने
स्थानसे विचलित कर देती है ॥ २८ ॥