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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 421 में से

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पृष्ठ 126

प्रलयकालमें लय नहीं होता। जो (स्थूल पदार्थ) अनित्य हैं उनको मोहके नामसे पुकारा
जाता है ।। ६ ।।
लोभप्रजनसम्भूता निर्विशेषा ह्यकिंचनाः ।
मांसशोणितसंघाता अन्योन्यस्योपजीविनः ।। ७ ।।
बहिरात्मान इत्येते दीनाः कृपणजीविनः ।
लोभ, लोभपूर्वक किये जानेवाले कर्म और उन कर्मोंसे उत्पन्न समस्त फल
समानभावसे वास्तवमें कुछ भी नहीं है। शरीरके बाह्य अंग रक्त-मांसके संघात आदि एक-
दूसरेके सहारे रखनेवाले हैं। इसीलिये ये दीन और कृपण माने गये हैं ।। ७ १/२ ।।
प्राणापानावुदानश्च समानो व्यान एव च ।। ८ ।।
अन्तरात्मनि चाप्येते नियताः पञ्च वायवः ।
वाङ्मनोबुद्धिभिः सार्द्धमिदमष्टात्मकं जगत् ।। ९ ।।
प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान—ये पाँच वायु नियतरूपसे शरीरके भीतर
निवास करते हैं; अतः ये सूक्ष्म हैं। मन, वाणी और बुद्धिके साथ गिननेसे इनकी संख्या आठ
होती है। ये आठ इस जगत्‌के उपादान कारण हैं ।। ८-९ ।।
त्वग्घ्राणश्रोत्रचक्षूंषि रसना वाक् च संयताः ।
विशुद्धं च मनो यस्य बुद्धिश्चाव्यभिचारिणी ।। १० ।।
अष्टौ यस्याग्नयो ह्येते न दहने मनः सदा ।
स तद् ब्रह्म शुभं याति तस्माद् भूयो न विद्यते ।। ११ ।।
जिसकी त्वचा, नासिका, कान, आँख, रसना और वाक्—ये इन्द्रियाँ वशमें हों, मन
शुद्ध हो और बुद्धि एक निश्चयपर स्थिर रहनेवाली हो तथा जिसके मनको उपर्युक्त
इन्द्रियादिरूप आठ अग्नियाँ संतप्त न करती हों, वह पुरुष उस कल्याणमय ब्रह्मको प्राप्त
होता है, जिससे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है ।। १०-११ ।।
एकादश च यान्याहुरिन्द्रियाणि विशेषतः ।
अहंकारात् प्रसूतानि तानि वक्ष्याम्यहं द्विजाः ।। १२ ।।
द्विजवरो! अहंकारसे उत्पन्न हुई जो मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ बतलायी जाती हैं, उनका
अब विशेषरूपसे वर्णन करूँगा, सुनो ।। १२ ।।
श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी ।
पादौ पायुरुपस्थश्च हस्तौ वाग् दशमी भवेत् ।। १३ ।।
इन्द्रियग्राम इत्येष मन एकादशं भवेत् ।
एतं ग्रामं जयेत् पूर्वं ततो ब्रह्म प्रकाशते ।। १४ ।।
कान, त्वचा, आँख, रसना, पाँचवीं नासिका तथा हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ और वाक्—
यह दस इन्द्रियोंका समूह है। मन ग्यारहवाँ है। मनुष्यको पहले इस समुदायपर विजय प्राप्त
करना चाहिये। तत्पश्चात् उसे ब्रह्मका साक्षात्कार होता है ।। १३-१४ ।।