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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 421 में से

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पृष्ठ 114

अष्टात्रिंशोऽध्यायः
सत्त्वगुणके कार्यका वर्णन और उसके जाननेका फल
ब्रह्मोवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि तृतीयं गुणमुत्तमम् ।
सर्वभूतहितं लोके सतां धर्ममनिन्दितम् ॥ १ ॥
ब्रह्माजीने कहा—महर्षियो! अब मैं तीसरे उत्तम गुण (सत्त्वगुण)-का वर्णन करूँगा,
जो जगत्में सम्पूर्ण प्राणियोंका हितकारी और श्रेष्ठ पुरुषोंका प्रशंसनीय धर्म है ॥ १ ॥
आनन्दः प्रीतिरुद्रेकः प्राकाश्यं सुखमेव च ।
अकार्पण्यमसंरम्भः सन्तोषः श्रद्दधानता ॥ २ ॥
क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् ।
अक्रोधश्चानसूया च शौचं दाक्ष्यं पराक्रमः ॥ ३ ॥
आनन्द, प्रसन्नता, उन्नति, प्रकाश, सुख, कृपणताका अभाव, निर्भयता, संतोष, श्रद्धा,
क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, किसीके दोष न देखना,
पवित्रता, चतुरता और पराक्रम—ये सत्त्वगुणके कार्य हैं ॥ २-३ ॥
मुधा ज्ञानं मुधा वृत्तं मुधा सेवा मुधा श्रमः ।
एवं यो युक्तधर्मः स्यात् सोऽमुत्रात्यन्तमश्नुते ॥ ४ ॥
नाना प्रकारकी सांसारिक जानकारी, सकाम व्यवहार, सेवा और श्रम व्यर्थ है—ऐसा
समझकर जो कल्याणके साधनमें लग जाता है, वह परलोकमें अक्षय सुखका भागी होता
है ॥ ४ ॥
निर्ममो निरहङ्कारो निराशीः सर्वतः समः ।
अकामभूत इत्येव सतां धर्मः सनातनः ॥ ५ ॥
ममता, अहंकार और आशासे रहित होकर सर्वत्र समदृष्टि रखना और सर्वथा निष्काम
हो जाना ही श्रेष्ठ पुरुषोंका सनातन धर्म है ॥ ५ ॥
विश्रम्भो ह्रीस्तितिक्षा च त्याग शौचमतन्द्रिता ।
आनृशंस्यमसम्मोहो दया भूतेष्वपैशुनम् ॥ ६ ॥
हर्षस्तुष्टिर्विस्मयश्च विनयः साधुवृत्तित्ता ।
शान्तिकर्मणि शुद्धिश्च शुभा बुद्धिविमोचनम् ॥ ७ ॥
उपेक्षा ब्रह्मचर्यं च परित्यागश्च सर्वशः ।
निर्ममत्वमनाशीष्ट्वमपरिक्षतधर्मता ॥ ८ ॥
विश्वास, लज्जा, तितिक्षा, त्याग, पवित्रता, आलस्यरहित होना, कोमलता, मोहका
अभाव, प्राणियोंपर दया करना, चुगली न खाना, हर्ष, संतोष, गर्वहीनता, विनय, सद्बर्ताव,