अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्र तत्र नियम्यन्ते सर्वे ते तामसा गुणाः ।
मोह, अज्ञान, त्यागका अभाव, कर्मोंका निर्णय न कर सकना, निद्रा, गर्व, भय, लोभ,
स्वयं शुभ कर्मोंमें दोष देखना, स्मरणशक्तिका अभाव, परिणाम न सोचना, नास्तिकता,
दुश्चरित्रता, निर्विशेषता (अच्छे-बुरेके विवेकका अभाव), इन्द्रियोंकी शिथिलता, हिंसा आदि
निन्दनीय दोषोंमें प्रवृत्त होना, अकार्यको कार्य और अज्ञानको ज्ञान समझना, शत्रुता, काममें
मन न लगाना, अश्रद्धा, मूर्खतापूर्ण विचार, कुटिलता, नासमझी, पाप करना, अज्ञान,
आलस्य आदिके कारण देहका भारी होना, भाव-भक्तिका न होना, अजितेन्द्रियता और
नीच कर्मोंमें अनुराग—ये सभी दुर्गुण तमोगुणके कार्य बतलाये गये हैं। इनके सिवा और भी
जो-जो बातें इस लोकमें निषिद्ध मानी गयी हैं, वे सब तमोगुणी ही हैं ।। १२—१६½ ।।
परिवादकथा नित्यं देवब्राह्मणवैदिकी ।। १७ ।।
अत्यागश्चाभिमानश्च मोहो मन्युस्तथाक्षमा ।
मत्सरश्चैव भूतेषु तामसं वृत्तमिष्यते ।। १८ ।।
देवता, ब्राह्मण और वेदकी सदा निन्दा करना, दान न देना, अभिमान, मोह, क्रोध,
असहनशीलता और प्राणियोंके प्रति मात्सर्य—ये सब तामस बर्ताव हैं ।। १७-१८ ।।
वृथारम्भा हि ये केचिद् वृथा दानानि यानि च ।
वृथा भक्षणमित्येतत् तामसं वृत्तमिष्यते ।। १९ ।।
(विधि और श्रद्धासे रहित) व्यर्थ कार्योंका आरम्भ करना, (देश-काल-पात्रका विचार न
करके अश्रद्धा और अवहेलनापूर्वक) व्यर्थ दान देना तथा (देवता और अतिथिको दिये
बिना) व्यर्थ भोजन करना भी तामसिक कार्य है ।। १९ ।।
अतिवादोऽतितिक्षा च मात्सर्यमभिमानिता ।
अश्रद्दधानता चैव तामसं वृत्तमिष्यते ।। २० ।।
अतिवाद, अक्षमा, मत्सरता, अभिमान और अश्रद्धाको भी तमोगुणका बर्ताव माना
गया है ।। २० ।।
एवंविधाश्च ये केचिल्लोकेऽस्मिन् पापकर्मिणः ।
मनुष्या भिन्नमर्यादास्ते सर्वे तामसाः स्मृताः ।। २१ ।।
संसारमें ऐसे बर्ताववाले और धर्मकी मर्यादा भंग करनेवाले जो भी पापी मनुष्य हैं, वे
सब तमोगुणी माने गये हैं ।। २१ ।।
तेषां योनीः प्रवक्ष्यामि नियताः पापकर्मिणाम् ।
अवाङ्निरयभावा ये तिर्यङ्निरयगामिनः ।। २२ ।।
ऐसे पापी मनुष्योंके लिये दूसरे जन्ममें जो योनियाँ निश्चित की हुई हैं, उनका परिचय दे
रहा हूँ। उनमेंसे कुछ तो नीचे नरकोंमें ढकेले जाते हैं और कुछ तिर्यग्योनियोंमें जन्म ग्रहण
करते हैं ।। २२ ।।
स्थावराणि च भूतानि पशवो वाहनानि च ।