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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 421 में से

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पृष्ठ 103

श्रद्धालक्षणमित्येवं धर्मं धीराः प्रचक्षते ।
इत्येवं देवयाना वः पन्थानः परिकीर्तिताः ।
सद्भिरध्यासिता धीरैः कर्मभिर्धर्मसेतवः ॥ ४४ ॥
विद्वानोंने श्रद्धाको ही धर्मका मुख्य लक्षण बतलाया है। इस प्रकार आपलोगोंके प्रति
देवयान मार्गोंका वर्णन किया गया है। धैर्यवान् संत-महात्मा अपने कर्मोंसे धर्म-मर्यादाका
पालन करते हैं ॥ ४४ ॥
एतेषां पृथगध्यास्ते यो धर्मं संशितव्रतः ।
कालात् पश्यति भूतानां सदैव प्रभवाप्ययौ ॥ ४५ ॥
जो मनुष्य उत्तम व्रतका आश्रय लेकर उपर्युक्त धर्मोंमेंसे किसीका भी दृढ़तापूर्वक
पालन करते हैं, वे कालक्रमसे सम्पूर्ण प्राणियोंके जन्म और मरणको सदा ही प्रत्यक्ष देखते
हैं ॥ ४५ ॥
अतस्तत्त्वानि वक्ष्यामि याथातथ्येन हेतुना ।
विषयस्थानि सर्वाणि वर्तमानानि भागशः ॥ ४६ ॥
अब मैं यथार्थ युक्तिके द्वारा पदार्थोंमें विभागपूर्वक रहनेवाले सम्पूर्ण तत्त्वोंका वर्णन
करता हूँ ॥ ४६ ॥
महानात्मा तथाव्यक्तमहंकारस्तथैव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च महाभूतानि पञ्च च ॥ ४७ ॥
विशेषाः पञ्चभूतानामिति सर्गः सनातनः ।
चतुर्विंशतिरेका च तत्त्वसंख्या प्रकीर्तिता ॥ ४८ ॥
अव्यक्त प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, दस इन्द्रियाँ, एक मन, पञ्च महाभूत और उनके
शब्द आदि विशेष गुण—यह चौबीस तत्त्वोंका सनातन सर्ग है। तथा एक जीवात्मा-इस
प्रकार तत्त्वोंकी संख्या पचीस बतलायी गयी है ॥ ४७-४८ ॥
तत्त्वानामिथ यो वेद सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ।
स धीरः सर्वभूतेषु न मोहमधिगच्छति ॥ ४९ ॥
जो इन सब तत्त्वोंकी उत्पत्ति और लयको ठीक-ठीक जानता है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें
धीर है और वह कभी मोहमें नहीं पड़ता ॥ ४९ ॥
तत्त्वानि यो वेदयते यथातथं
गुणांश्च सर्वानखिलांश्च देवताः ।
विधूतपाप्मा प्रविमुच्य बन्धनं
स सर्वलोकानमलान् समश्नुते ॥ ५० ॥
जो सम्पूर्ण तत्त्वों, गुणों तथा समस्त देवताओंको यथार्थरूपसे जानता है, उसके पाप
धुल जाते हैं और वह बन्धनसे मुक्त होकर सम्पूर्ण दिव्यलोकोंके सुखका अनुभव करता
है ॥ ५० ॥