अणुभाष्य (महाप्रभु वल्लभाचार्य - शुद्धाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य प्रकाश टीका सहित)
Anubhashya on Brahma Sutras by Mahaprabhu Vallabhacharya with Commentary
महाप्रभु वल्लभाचार्य (टीकाकार: गोस्वामी पुरुषोत्तम जी महाराज) द्वारा
इस ग्रन्थ के बारे में
अणुभाष्य महाप्रभु वल्लभाचार्य (जन्म १४७९ ई.) का ब्रह्मसूत्र पर लिखा भाष्य है, जो शुद्धाद्वैत वेदान्त और पुष्टिमार्ग का आधार-ग्रन्थ है। वल्लभाचार्य के मत में ब्रह्म माया से सर्वथा अछूता है, जगत् ब्रह्म का वास्तविक कार्य है, और श्रीकृष्ण की अनुग्रह-रूप पुष्टि-भक्ति मोक्ष का श्रेष्ठ मार्ग है। यह भाष्य वल्लभाचार्य पूरा नहीं कर सके थे; इसका शेष अंश उनके पुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ ने पूरा किया।
ब्रह्मसूत्र के चार अध्याय हैं — समन्वय, अविरोध, साधन और फल — और भाष्य इन्हीं के क्रम में चलता है। इस संस्करण में अणुभाष्य के साथ गोस्वामी पुरुषोत्तमजी की प्रसिद्ध टीका 'भाष्यप्रकाश' और उस पर 'रश्मि' नाम की उप-टीका भी दी गई है, जिससे शुद्धाद्वैत की पारम्परिक व्याख्या पूरे विस्तार से सामने आती है।
स्कैन किए गए आरम्भिक पृष्ठों के अनुसार इसका सम्पादन और भूमिका मूलचन्द्र तुलसीदास तेलीवाला की है, और गोस्वामी श्री श्याम मनोहरजी महाराज ने नई भूमिका लिखी है। अंग्रेज़ी भूमिका में वल्लभाचार्य के जीवन, उनकी यात्राओं (विजयनगर, काशी, अडैल) और उनके दर्शन का परिचय है। पूरे ग्रन्थ में लगभग २६०० पृष्ठ हैं।
परिशिष्टम्। १०१
तदा समागमिष्यामि दुःखं मा कुरुत प्रियाः ।
दुःखं विरहदुःखम् ।
वस्तुतस्तु विरहो नास्तीत्याहुः सर्वेति ।
सर्वेशे गोकुलाधीशे शरणा एव सर्वतः ॥ १० ॥
शरणा इत्यत्र ‘शरणं गृहरक्षित्रो’रिति कोशः । ‘भवतीनां वियोगो मे न हि सर्वात्मना
क्वचित् । आत्मत्वाद् भक्तवश्यत्वात् सत्यवाक्त्वात् खमात्रवत्’ इति वाक्यात् । ‘रक्षतीत्येव विश्वासः
षड्विधा शरणागति’रिति पञ्चरात्रे ।
अत इति ।
अतश्चिन्ता न कर्तव्या भवद्भिः कृष्णसात्कृतैः ॥ ११ ॥
उक्ताद् दृश्यमानात् सन्दर्भाच्च चिन्ता केच्छा, ईश्वरः क, यद्येश्वरं प्रादुर्भावित इति ‘उत्कर्ष-
श्चापि वैराग्ये’ ममेश्वरोऽङ्गीकृतवान् किमुदासीनः क्लिष्टः किं व्यापको वा क्लिष्टः काहम् केश्वर इत्यादि
चिन्ता न कर्तव्या कृष्णसात्कृतैः कृत्स्ना यूयं कृष्णाः संपद्यन्ते तथा कृताः कृष्णसात्कृताः
यतः । अस्मिन्मार्गे ‘सच्चिदानन्दता स्वत’ इति निरोधलक्षणे । किञ्च ।
श्रीगोकुलजीवनः सर्वं भद्रमेव करिष्यति ।
श्रीगोकुलस्य निःसाधनस्य जीवनो जीवयिता, यूयं तु कृततपस्काः कुतः सन्देहो जीवनेपि।
किञ्च ।
अहं यथा शीघ्रं दर्शनं प्राप्नोमि तथा विधेयं प्रत्यहम् ॥ १२ ॥
भवन्तौ भगवांश्च विसदृशीः लीलाः परित्यज्य चित्तदोषजनकलीलाः कुर्वीतचेदिष्टं चित्तदोषेषु
भक्त्यभावाद् दर्शनं न प्राप्स्यामि । ‘अदूरे विप्रकर्षे वा यथा चित्तं न दुष्यती’ति वाक्यात् । ततः
स्वेषु चित्तदोषजनकलीलारूपं विशेषणं विधेयमिति भावः, तदपि प्रत्यहम् ।
उपसंहरति शरणमार्गमैहिकेति ।
ऐहिके पारलोके च सर्वथा शरणं हरिः ।
संपत्स्वापत्स्वपि सदा शरणं हरिरेव हि ॥ १३ ॥
स्पष्टम् ।
एवं तत्तद्रूपसन्निधानमेव तत्तत्फलदानादिप्रयोजकमित्यर्थः समासेन न तु व्यासेन ।
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। क्रीडामग्ना? No!
Wait, look at the quote:
"यथा 'क्रीडास्तमेव जाताः'" or "यथा 'कीडा ममैव जाताः'" or "यथा 'क्रीडामय्य एव जाताः'"?
Let's zoom in on line 11:
य थ ा ' क ् र ी ड ़ ा . . .
Letters:
क ् र ी ड ़ ा (क्रीडा)
म (ma)
य ् य (yya)
ए (e)
व (va)
Wait! "क्रीडामय्य एव जाताः"!!
In Gopika-lila, the Gopis became "kridamayi":
"लीलाभावनायां तु तद्रूपतापत्तिः यथा 'क्रीडामय्य एव जाताः'"!
Yes! 'क्रीडामय्य एव जाताः'!
Now look at the next words:
"एतदर्थस्तु तदासक्त्या देहादिषु सर्वत्र क्रियासु ज्ञानेषु पदार्थेष्वश्लिष्टेषु चान्येषामन्यथा-"
Wait, "पदार्थेष्वश्लिष्टेषु" or "पदार्थेष्वश्लिष्टेषु"?
प द ा र ् थ े ष ् व श ् ल ि ष ् ट े ष ु or "पदार्थेषु चाश्लिष्टेषु"?
Look:
प-द-ा-र ्-थ-े-ष ्-
परिशिष्टविषयानुक्रमः ।
| विषयः | श्लोकाङ्कः | पत्राङ्कः | विषयः | श्लोकाङ्कः | पत्राङ्कः |
|---|---|---|---|---|---|
| प्रभुध्यानम् | १ | १ | हिन्दोलारोहणम् | १ | ५१ |
| देवीभाग्याभिनन्दनम् | २ | ३ | पवित्रोत्सवः | १-४ | ५१-५३ |
| अलौकिकज्ञानादि | ३ | ३ | रक्षाभावना | ५ | ५३ |
| भावस्वरूपध्यानम् | १५-२१ | ४-१४ | एवं प्रत्यब्दकरणे फलत्वं | ||
| स्वरूपं प्रस्तोतुं मङ्गलम् | १ | १४ | सेवायाः | ६-९ | ५३-५५ |
| तुरीयपुरुषार्थसाधनम् | २ | १४ | सेवायां संयोगभावमुक्त्वा | ||
| स्वरूपस्यानन्दत्वम् | ३ | १४ | वियोगे विरहभावनम् | १-८ | ५५-५८ |
| तत् सिद्धयर्थं सेवनम् | ४ | १४ | नित्यसेवाभावना | १०५ | ६०-९२ |
| भगवान् तनुजाद्यै सेव्याः | ५ | १५ | भगवन्मन्दिरप्रार्थना | १ | ६० |
| आचार्यसेवितानि स्वरूपाणि | ६ | १५ | तन्मार्जनादि | २-३ | ६१ |
| श्रीगोवर्द्धननाथधर्मिस्वरूपम् | सिंहासनक्षालनम् | ४ | ६१ | ||
| तत्पीठिकाभावना च | ७ | १६ | जलपात्रभावनम् | ५ | ६२ |
| श्रीनवनीतप्रिये ऐश्वर्यम् | ८ | १७ | भोजनपात्राणां भावना | ६ | ६२ |
| श्रीमथुरानाथे वीर्यम् | ९ | १९ | प्रभोः प्रबोधनम् | ७ | ६३ |
| श्रीविठ्ठलेश्वरे यशः | १० | २१ | स्नपनम् | ८-९ | ६३ |
| श्रीद्वारकेश्वरे श्रीः | ११ | २१ | नमनम् | १० | ६३ |
| श्रीगोकुलचन्द्रे ज्ञानम् | १२ | २२ | शक्तिविज्ञापनाम् | ११ | ६४ |
| श्रीगोवर्द्धनधारिणि वैराग्यम् | १३ | २२ | श्रीमदाचार्यप्रार्थनम् | १२ | ६४ |
| श्रीमदनमोहने संयोगो | मङ्गलभोगविज्ञापनाम् | १३-२२ | ६५-६८ | ||
| धर्मारमा रसः | १४ | २३ | उच्छिष्टदानप्रार्थना | २३-२४ | ६८ |
| औत्सङ्गिकेष्वनेकलीला- | जलपात्रार्पणं तद्भावश्च | २५ | ६९ | ||
| निवेशः | १५ | २४ | आचमनम् | २६ | ६९ |
| शृङ्गारस्वरूपम् | १-१३ | २५-३५ | मुखवस्त्रम् | २७ | ७० |
| उत्सवानां भावना | ३६ | ५९ | ताम्बूलार्पणम् | २८ | ७१ |
| प्राकट्यभावनम् | १-६ | ३६-४० | स्नानार्थ विज्ञापनाम् | २९-३० | ७१ |
| राधाष्टमी | २ | ४१ | अभ्यङ्गम् | ३१-३२ | ७२ |
| वामनाविर्भावः | १ | ४१ | उद्वर्तनम् | ३३ | ७२ |
| विजयदशमी | १-२ | ४१ | स्नानम् | ३४ | ७३ |
| दीपोत्सवः | १-२ | ४२ | प्रोञ्छनम् | ३५ | ७३ |
| गोवर्द्धनपूजा | १-२ | ४३ | शृङ्गारभावविचारः | ३६-३८ | ७३-७४ |
| अन्नकूटः | १-२ | ४३ | अङ्गरागार्पणम् | ३९ | ७४ |
| प्रबोधिनी | १-२ | ४३-४४ | वस्त्रार्पणम् | ४० | ७५ |
| गतचर्या | १ | ४५ | भूषणार्पणम् | ४१ | ७५ |
| वसन्तः | १-२ | ४६ | गुञ्जामालार्पणम् | ४२ | ७५ |
| दोलोत्सवः | १-२ | ४६-४७ | मयूरचन्द्रिकार्पणम् | ४३ | ७५ |
| रामाविर्भावः | १-२ | ४७ | अञ्जनम् | ४४ | ७५ |
| श्रीमद्भागवतोत्सवः | १ | ४८ | तिलकम् | ४५ | ७६ |
| चन्दनयात्रा | १ | ४८ | पुष्पमालार्पणम् | ४६ | ७६ |
| नृसिंहाविर्भावः | १ | ४८ | वेणोः धारणम् | ४८ | ७६ |
| ज्येष्ठाभिषेकः | १-३ | ४९ | भावतार्थसंसर्गम् | ४९ | ७६ |
| रथोत्सवः | १-३ | ५०-५१ | गोपीवल्लभभोगः | ५० | ७७ |
| 2461 |
२
विषयः श्लोकाङ्कः पत्राङ्कः │ विषयः श्लोकाङ्कः पत्राङ्कः
गोपार्पितपयःफेनं पयोर्पणञ्च ५१-५३ ७७ │ उत्थापनेफलाद्यर्पणम् ८०-८१ ८५
आरात्रिकम् ५४ ७८ │ सन्ध्याभोगादिनिवेदनम् ८२-८४ ८६
श्रीनवनीतप्रियस्य प्रेङ्खा- │ शृङ्गारोत्सारणम् ८५ ८६
न्दोलनम् ५५ ७८ │ दुग्धं सत्केनं चार्पणीयम् ८६ ८६
क्रीडनकादिनिवेदनम् ५६ ७८ │ तमोदीपनिवेदनम् ८७ ८६
राजभोगार्पणे धूपः ५७ ७९ │ शयनभोगार्पणम् ८८ ८७
दीपः ५८ ७९ │ शायनम् ८९ ८७
पात्रादिभावविचारः ५९-६२ ७९ │ कीर्त्तनेनानवसरभावनम् ९०-९५ ८७-९०
शङ्खोदकेन संस्कारम् ६३ ८० │ फलनिष्कर्षः ९६ ९०
तुलसीप्रक्षेपः प्रार्थना च ६४-६६ ८१ │ श्रीमदाचार्यसेवनम् ९७-९९ ९०-९१
महामन्त्रेण चरणयोस्तुलसी- │ पञ्चामृतभावना १००-१०५ ९१-९२
समर्पणम् ६७-६८ ८१ │ दैन्येन प्रार्थनम् १ ९२
पादपीठार्पणम् ६९ ८२ │ नामसेवनम्
पुष्पमालार्पणम् ७० ८२ │ कृतसेवाचिन्तनम् २७ ९३-९६
आरात्रिकम् ७१ ८२ │ शरणमार्गः १ ९७
अनवसरभावनम् ७२-७७ ८२-८४ │ श्रीयमुनाप्रार्थना २-३ ९८
द्वारपिधानभावनम् ७८ ८४ │ त्रयोदशाभिरन्तिमविज्ञप्तिः १-१३ ९८-१०१
अनन्तरकरणीयम् ७९ ८४ │
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