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सर्वकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 811 में से

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पृष्ठ 103

सर्गः ९] सारकाण्डम् ८७

ततः सीताप्रत्ययार्थं रूपं स्वं दर्शयन् कपिः ।
ततः पुनः प्रत्ययार्थं सीतायै गद्यचोदितम् ॥११७॥
मनःशिलायास्तिलकं चित्रकूटगिरौ कृतम् ।
कपिस्तत्कथयामास पूर्ववृत्तं सविस्तरम् ॥११८॥
तच्छ्रुत्वा जानकी तं प्राह हर्षोद्रेकाद्वचोऽब्रवीत् ।
अनुज्ञां देहि मे मातस्तद्वाभिज्ञानं प्रदास्य माम् ॥११९॥
सा तं चूडामणिं पित्रा दत्तं केशान्तग्रन्थितम् ।
निष्कास्य हस्ततो दत्त्वा पूर्वं काकेन यत्कृतम् ॥१२०॥
चित्रकूटगिरौ वृत्तं कथयामास तत्कपिम् ।
ततो नत्वा रामपत्नीं चिंतयामास चेतसि ॥१२१॥
स्वामिकार्यं कृतं चैतदन्यत्किञ्चित्करोम्यहम् ।
इति निश्चित्य मनसा जानकीं पुनरब्रवीत् ॥१२२॥
मातर्मेऽतीव क्षुद्बोधस्त्वद्य विकल्पतो महान् ।
अस्मिन्वनेऽतिमधुरः फलचयोऽतिदुर्लभः ॥१२३॥
तवानुज्ञाऽद्य संनेऽहं करिष्ये भक्षणं ध्रुवम् ।
इति तद्वचनं श्रुत्वा जानकी व्यग्रकंकणम् ॥१२४॥
निष्कास्य हस्तात् प्राह गृहीत्वेदं प्लवङ्गम ।
अनेन फलभागान् लब्ध्वाह्वाऽमृतञ्च वा ॥१२५॥
भुङ्क्ष्वेतिवच्गत्वात्वश्चवनेऽस्मिन्फलोद्ध्वंसं मा ।
तदा कपिः पुनः प्राह पत्रद्रुमफलानि हि ॥१२६॥
नाहं भुंजामि माते मे अनवाप्ति ब्रजाम्यहम् ।
व्रजन् मारुतः शृण्वा सीता वचनमब्रवीत् ॥१२७॥
भो बालक कपिश्चेष्ट गहणोऽस्ति वनाधिपः ।
न शक्तिर्न च शक्यं ते कथञ्च भक्षयिष्यसि ॥१२८॥
तत्तस्या वचनं श्रुत्वा मारुतिः प्राह जानकीम् ।
श्रीरामेशि परं भद्रराम मे हृदयांतरे ॥१२९॥
तन सर्वाणि रुंजामि तृणरूपाणि सांप्रतम् ।
तदा तं जानका प्राह पतितान्यत्र वै भुवि ॥१३०॥
सुस्वादूनि फलानि त्वं तूणीं मा घोटयात्र वै ।
तदातं मारुतिश्चोत्वा वृक्षान्पुच्छेन चालयन् ॥१३१॥
वृक्षान्दोलनमात्रेण निपेतुश्च फलानि हि
भक्षयामास तान्येव सुफलानि क्षणेन सः ॥१३२॥
ततो वृक्षान्समुत्पाट्य लांगूलेन स मारुतिः
क्षिप्त्वा तान्यग्रवृक्षेषु समस्नानि फलानि वै ॥१३३॥
पातयामास भूम्यां तु भक्षयामास तानि सः ।
भक्षितानि समस्तानि फलानि वनजानि हि ॥१३४॥


... न जाना। इतीन' मत कहनेसे आप निर्भय रह ॥ १२५ ॥ १२६ ॥ तब हनूमान् सीताका विश्वास ... करनेके लिए अपना असली स्वरूप दिखाया । तत्पश्चात् सीताके विश्वासके लिए जानकी रामका कहा ... हुआ 'चन्द्रक' दिया मनःशिलका तिलक आदि का वृत्त या बतला दिया । साथ ही और भी पहलेका वृतान्त ... सीताको सुनाया । ११७ ॥ ११८ ॥ तब हर्षमें आ सीताजीसे हनुमानने कहा—हे माता अब आप मुझे ... जानेकी आज्ञा दे तथा अपना कोई चिह्न भी दे दें ॥ ११९ ॥ तब सीताने पिताकी दी हुई चूडामणि शिरके बालाम- ... में निकालकर उनके हाथ में दी और पूर्वम चित्रकूटगिरिका वह ( जयन्त ) का किया हुआ वृतान्त हनुमानको ... सुनाया । तत्पश्चात् रामजीकी संभाको नमस्कार करके हनुमान् मनम सोचने लगे—१२०। १२१॥ ... कि स्वामि का कहा हुआ काम ता कर दिया, पर और भी कुछ करत चलना चाहिए । ऐसा निश्चय करके वे ... जानकी से बोले—॥ १२२ ॥ हे माता ! आज थकावटके साथ बड़ी भूख लगी हुई है । इस वनम अतिशय ... दुर्लभ अति मधुर फलांका समूह लगा हुआ है । १२३ ॥ मैं आपकी आज्ञासे इनक अवश्य खाऊंगा । ... तब तो जानकीने हाथसे उतारकर अपना कंकण उनको दिया और कहा—हे प्लवङ्गम ! यह लो और ... दूर दुकानपरसे य नके ढेर खरीद लो और इसे खाकर जाओ परन्तु इस वनके फल न तोड़ना । ... तब मारुत कहा कि वृक्षोंके वे तोड़े फल मैं नहीं खाता । हे मात ऐसा मेरा व्रत है। आपकी बात ... है मैं ऐसे ही जाता हूँ । जाते हुए मारुतका देखकर सीताने कहा—१२४–१२७॥ हे बालक ! हे ... कयि वनेष कपि ! इस उपवनका अधिपति रावण है । तुम्हारी इतनी शक्ति नहीं है कि तुम उसका अंत ... करक फल कैसे खाओगे ? । १२८ । यह सुनकर मारुतिने जानकीसे कहा कि मेरे हृदयमें 'श्रीराम' ... इस प्रकारक अमोघ शक्ति विद्यमान है ॥ १२९ ॥ रामक प्रभावसे मैं इन सब राक्षसोंको तृणवत समझता हूँ । तब ... जानकीने कहा कि जा फल पृथ्वीपर गिर पड़े हो, ॥ १३० ॥ उनको तुम चुपचाप खा लो, पेड़वरसे न ताड़ना । ... बहुत अच्छा कहकर हनुमान्ने अपनी पूँछमे बाँधकर वृक्षोंको हिलाया ॥ १३१ ॥ वृक्षोको हिलानेसे सब ... अच्छे गिर पड़े । उन्होंने उन सब सुन्दर फलोको क्षणभरम खा लिया ॥ १३२ ॥ फिर हनुमानने उन वृक्षोंको