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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

अशफाक चले गये और अलविदा से पहले देश के नाम अपना
संदेश छोड़ गये। संदेश के माध्यम से हम उनके वैचारिक धरातल को
ठीक से समझ सकते हैं, उनके कृतित्व व्यक्तित्व के विषय में तमाम
सच्चाइयों का पता भी चलता है।
फाँसी पर जाने के पूर्व अशफाक ने कहा भी था - "भारत माता के
रंगमंच पर अपना पार्ट अब हम अदा कर चुके। हमने गलत-सही जो कुछ
किया वह स्वतंत्रता प्राप्ति की भावना से किया। हमारे इस काम की कोई
प्रशंसा करेगा तो कोई निंदा। किन्तु हमारे साहस और वीरता की प्रशंसा
हमारे दुश्मनों तक को करनी पड़ी है। क्रांतिकारी बड़े वीर योद्धा और बड़े
अच्छे वेदान्ती होते है। वे सदैव अपने देश की भलाई सोचा करते हैं। वे
कहते है कि हम देश को भयग्रस्त करते हैं, किन्तु बात ऐसी नही हैं।
इतनी लम्बी मियाद तक हमारा मुकदमा चला, मगर हमने किसी एक
गवाह तक को भयग्रस्त करने की चेष्टा नहीं की, न किसी मुखबिर को
गोली मारी। हम चाहते तो किसी गवाह, किसी खुफिया पुलिस के
अधिकारी या किसी अन्य ऐसे आदमी को मार सकते थे, किन्तु यह
हमारा उद्देश्य नही था। हम तो कन्हाईलाल दत्त, खुदी राम बोस, गोपी
मोहन साहा आदि की स्मृति में फाँसी पर चढ़ जाना चाहते थे।
जजों ने हमे निर्दय, बर्बर, मानव कलंक आदि विशेषणों से याद
किया है। किन्तु हम पूछते हैं कि क्या इन जजों ने जलियावाला बाग में
गोली चलाते देखा या सुना, क्या उसने निरस्त्र भारतीयों-स्त्री पुरुष, बाल
वृद्ध सब पर गोलियाँ नहीं चलायी थी। कितने जजों ने उसे इन विशेषणों
से विभूषित किया। फिर क्या यह मजाक हमारे ही साथ उड़ाने को है।
भारतीय भाइयों, आप कोई हों, चाहे जिस धर्म या सम्प्रदाय के अनुयायी
हों, परन्तु आप देशहित में एक जुट होकर योग दीजिए। आप लोग व्यर्थ
में लड़-झगड़ रहे हैं। सब धर्म एक है, रास्ते चाहे भिन्न-भिन्न हो परन्तु
लक्ष्य सबका एक ही है।
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फिर यह झगड़ा बखेड़ा क्यों? हम मरने वाले काकोरी के अभियुक्तों
के लिए आप लोग एक हो जाइए और सब मिलकर नौकर शाही का
मुकाबला कीजिए। यह सोचकर कि 7 करोड़ मुसलमान भारतवासियों में मैं
सबसे पहला मुसलमान हूँ जो भारत माता की स्वतंत्रता के लिए फाँसी पर
चढ़ रहा हूँ, मैं मन ही मन अभिमान का अनुभव कर रहा हूँ किन्तु मैं
यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि मैं हत्यारा नहीं था, जैसा कि मुझे
साबित किया गया है।
अब मैं विदा होता हूँ। ईश्वर आप सबका भला करे। इस अवसर
पर एनुद्दीन, मजिस्ट्रेट श्रीखैरात अली, पब्लिक प्रोसीक्यूटर, सी०आई०डी०
के अधिकारी खासकर खान बहादुर तसद्‌दुक हुसैन साहब तथा अन्य
गवाहों को धन्यवाद देना अनुचित न होगा। क्योंकि इन्ही की कृपा से
यह मान मर्यादा प्राप्त हुई। मेरे परिवार में आज तक देश सेवा के लिए
कोई त्याग न हुआ था, अब यह कलंक छूट जायेगा। अन्त में अपने
साथी अभियुक्तों तथा मुखबिरों और इकबाली मुलजिमों से भी वन्दे करता
हूँ। सबको आखिरी सलाम। भारतवर्ष सुखी हो मेरे भाई आनंद लाभ करें।''¹
निश्चित ही अशफाक को समझना अपने देश की संस्कृति की झलक
पाना है। अशफाक उल्ला खाँ ने स्वतंत्रता को मेहनतकश जनता के
जीवन की स्वतंत्रता से जोड़ा था। क्योंकि उनके लिए देश केवल धरती,
जंगल पहाड़, नदी नाले से नहीं है। जनता के बिना देश या राष्ट्र का
कोई मतलब नहीं होता। उन्हें पता था देश की बहुसंख्यक जनता गाँव में
रहती है। अधिकतर लोग गरीबी की चक्की में पिस रहे हैं, कम दिहाड़ी
पर कारखानों में काम कर रहे हैं, लाखों सड़क पर हैं। इसलिए देश को
आजाद करना है तो इन्हें आगे लाना होगा। किसानों, मजदूरों को
संगठित करना होगा।

  1. अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -156-157

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अशफाक ने कहा है कि -'मेरा दिल गरीब किसानों और दुखियों
मजदूरों के लिए हमेशा दुखी रहा है। मैं तो अपने अय्यामें फरारी में भी
अक्सर इनकी हालत देखकर रोया किया हूँ क्योंकि मुझे इनके साथ दिन
गुजारने का मौका मिला है। निश्चित ही अशफाक उल्ला खाँ उस दौर के
क्रांतिकारियों में एक मजबूत चरित्र के रूप में नजर आते हैं। जहाँ एक
तरफ संवेदनशील और प्रगतिशील कवि, शायर के रूप में हमे नजर आते
है वही वे एक कुशल पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में दृढ़ता से खड़े दिखते
हैं और अन्त तक उनके विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया। प्रमुख
क्रांतिकारी नेता अमर शहीद सरदार भगत सिंह ने लिखा है कि -“आप
(अशफाक) श्री राम प्रसाद के दायें हाथ थे, मुसलमान होने के बावजूद
आपको कट्टर आर्य समाजी धर्म से हर दर्जे तक का प्रेम था। दोनों प्रेमी
एक बड़े काम के लिए अपने प्राण उत्सर्ग कर अमर हो गये।”
शहीदे आज़म अशफाक उल्ला खाँ ने देश की आजादी के लिए
अपने प्राणों की आहुति दी। उनका यह उत्सर्ग आने वाली पीढ़ियाँ सदैव
स्मरण करेंगी तथा उनके कृतित्व एवं व्यक्तित्व से हमेशा प्रेरणा पाती
रहेंगी।
अशफाक के शब्द आज भी स्मृति में है और गूँजते हैं -
“कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो यह है,
रख दे कोई जरा - सी खाके वतन कफन में।”
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