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सर्वकोश
अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 128 में से

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पृष्ठ 96

[ २६ ]
राजयोगः स कथितः स एव मुनिपुंगव ।
राजत्वात् सर्वयोगानां राजयोग इति स्मृतः ॥ ३ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ, वही राजयोग कहा गया है, क्योंकि वह सब योगों का राजा
है, इसलिए राजयोग कहलाता है ॥ ३ ॥
राजानं दीप्यमानं तं परं ब्रह्माणमव्ययम् ।
देहिनः प्रापयेद् यस्तु राजयोगः स उच्यते ॥ ४ ॥
जो योग देहधारियों को राजा के तुल्य शोभायमान ( देदीप्यमान ) उस
अव्यय परब्रह्म में पहुँचाता है, वह राजयोग कहलाता है ॥ ४ ॥
राजयोगस्य महात्म्यं को वा जानाति तत्त्वतः ।
ज्ञानात् सिद्ध्यति मुक्तिर्हि गुरोर्ज्ञानं च लभ्यते ॥ ५ ॥
हे मुनिवर, राजयोग का वास्तविक महात्म्य कौन जान सकता है ? उसके
ज्ञान से मुक्ति प्राप्त होती है और गुरु से ज्ञान प्राप्त होता है ॥ ५ ॥
अन्तर्योगं बहिर्योगं यो जानाति विशेषतः ।
मया त्वयाप्यसौ वन्द्यः शेषैर्वन्द्यस्तु किं पुनः ॥ ६ ॥
जो पूर्वोक्त अन्तर्योग और बहिर्योग को विशेषरूप से ( तत्त्वतः ) जानता
है वह मेरा और तुम्हारा भी वन्दनीय है, औरों का वन्दनीय है इसमें तो
कहना ही क्या है ? ॥ ६ ॥
चित्तं बुद्धिरहंकार ऋत्विक् सोमश्च पंचमः ।
इन्द्रियाणि दश प्राणान् जुहोति ज्योतिर्मण्डले ॥ ७ ॥
चित्त, बुद्धि, अहंकार, ऋत्विक् और पांचवां सोम—ये दस इन्द्रियों और
प्राणों का ज्योतिर्मंडल में हवन करते हैं १ ॥ ७ ॥
१. देह में पांच तत्त्व हैं—चित्त, बुद्धि, अहंकार, ऋत्विक्, ( कर्म करनेवाली
अस्मिता, एवं सोम ( अमृत, मन ) । ये पांचों होम करने वाले हैं ।
दश इन्द्रियाँ होम की सामग्रियाँ हैं ( हव्य हैं ) और ज्योतिर्मण्डल होम
कुण्ड है ।