अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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गोरक्षमालं गुरुशिष्यपालम्,
शेषांहिमालं शशिखण्डभालम् ।
कालस्य कालं जितजन्मजालम्,
वन्दे जटालं जगदब्जनालम् ॥
वाहनरूप गौ ( महोक्ष ) की रक्षा करनेवाले अर्थात् स्वयं
भगवान् शंकर उनकी भा, महातेजोरूप विभूति, साधक भक्तों को
प्रदान करनेवाले अथवा महान् योगी के रूप से विख्यात जो गोरक्ष
( गोरक्षनाथ ) हैं उनकी योगजनित महादीप्ति साधक योगियों को
प्रदान करनेवाले अथवा गौ अर्थात् इन्द्रियों की उनके तत्-तत्
विषय ( रूप, रस आदि ) से रक्षा करनेवाले योगिजनों को महाते-
जोरूपा विभूति प्रदान करनेवाले अथवा गौओं के रक्षकों को पुण्य-
प्रभा से उद्भासित करनेवाले, गुरू और शिष्य दोनों को विघ्न-
बाधाओं—आधिभौतिकादि उपद्रवों—से बचानेवाले या उनका पालन
करनेवाले, गुरू-शिष्य-परम्परा को निरन्तर अक्षुण्ण रखनेवाले, शेष-
नाग की माला धारण करनेवाले, मस्तक पर चन्द्रलेखा धारण करने-
वाले, काल के भी काल ( महाकालस्वरूप ), जन्म, जरा, मरण आदि
की परम्परा पर विजय प्राप्त कर चुके अर्थात् अनादिनिधन एवं
जैसे नाल ( कमलनाल ) कमल का अधार है वैसे इस जगत् के
के अधारभूत जटाधारी भगवान् को मैं प्रणाम करता हूँ ।