आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
१२ आल्हखण्ड । ६१६
जो नहिं अनुचितकरुदुनिया में तौनहिंहोयसजायहिराज ११८
इन रजधानी में रहिकै मैं कबहुँनकष्ट सहा क्यहुकाल ॥
पिता पितामह औ मोसंयुत कबहुँनपर्यनबिपतिकेजाल ११९
चोर छिनारन बदगासन की पिंडुरी थहर थहर थर्थायँ ॥
मोढ़ा टेवै सज्जन बैठे नहिंकहुँमसातलकभन्नाय १२०
यह सब गावत हैं सज्जन मन नित प्रति बना रहे यह-राज ॥
जीवैं रानी महरानी ई जिनवलसुजनसुखीसवसाज १२१
इनअसिमाता अब मिलिहैं ना यह मन नित्त लीन ठहराय ॥
मिलैं प्रबन्धौ असकर्त्ता ना जसकछुआजकाल्हादिखलायँ १२२
यहौ कथा अब पूरण करिकै ललिते करत मंगलाचार ॥
करों वन्दना मैं तुलसी की हुलसीजासु काव्यसंसार १२३
ज्यहि अवलोकन के करतैखन मनके छूटि जात सब ताप ॥
सोई प्यारी तुलसी गाथा ललितेकीनबहुतदिनजाप १२४
खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डा गड़ा निशाको आय ॥
तारागण सब चमकन लागे सन्तनधुनी दीन परचाय १२५
पूरि तरंग यहाँ सों ह्वैहै तब पद सुमिरि भवानीकन्त ॥
राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छायही मोरिभगवन्त १२६
इति श्रीलखनऊनवासि(सी,आई,ई)मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबूप्रयागनारायण
जीकी आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्र
वंशोद्भव बुध कृपाशंकरसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत वेलासती
व्याख्यावर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥
वेलासती अर्थात सर्वआल्हखण्डसमाप्तशुभमस्तु ॥
इति ॥
The provided image is completely blank and does not contain any text to transcribe.