आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनाहिं छुवउँ तलवारि न हाथ न मातु कहावों पूत तुम्हारा ।
ठाकुर सोइ कहैं ललिते जो मेरै रण खेतन में असिधारा ६८
इतनी कहिकै ऊदन बिगरे औ मातासों लगे बतान ॥
अब हम जइहैं गढ़ माड़ो को हमरो भलाकरैं भगवान ६६
कहा न मनिहैं हम काहू को हमरो सत्य वचन करु कान ॥
घर में माता अब तुम बैठो मनमें धरे रामको ध्यान ७०
बराबरस का क्षत्रिक लरिका ज्यहिकै ऐंची अवै कमान ॥
त्यहि का बैरी सुखते स्वावै जिन्दा मुरदाके अनुमान ७१
बातैं सुनिकै ये ऊदन की द्यावलि हाथ पकरि तब लीन ॥
पकरिकै बाहू बघऊदन की आल्हानिकटगमनाफिरिकीन ७२
मलखे सुलखे देबा आल्हा ताहन बनरस का सरदार ॥
आवत दीख्यो जब माता को सबहिन कीन्ह्यो रामजुहार ७३
द्यावलि बोली तब ताहन ते छोटे देवर लगो हमार ॥
माहिल आये हैं उरई ते तिनते सुने सिछुट कवाम्बार ७४
करिया मार्यो म्वरे बाप को सो यहु बदल लेनको जाय ॥
जालिम राजा है माड़ो का ताते मोर प्राण घबड़ायँ ७५
तुमका सौंपति हौं ऊदन को इनका माड़ो लवो दिखाय ॥
इतनी सुनि कै आल्हा बोले घरमाँ बैठु लहुरवा भाय ७६
धुआँ न दीखे तू तोपन का ना रण नाँगि दीख तलवार ॥
अड़वड़ क्षत्री है माड़ो का मानि ल्यो कहा हमार ७७
इतनी सुनिकै ऊदन बोले कहाँ कहा शोभै गा त्वार ॥
टँगी खुपरिया म्वरे बाप की राजा जम्बै क्यरे दुवार ७८
नालति ऐसी रजपूती को दादा जीबे को धिक्कार ॥
क्षत्री हैकै समर सकाना ताको खायँ गिद्ध नहिंस्यार ७६