आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हाखण्ड । ५८६
दैया दैया करि मरि जावै ज्यहिनहिंचरणकमलआधार४
छूटि सुमिनी गै देवी कै शाक्ता सुनो शूरमन क्यार ॥
चन्दन वगिया को कटवाई ठाकुर उदयसिंह सरदार ५
अथ कथाप्रसंग ॥
ब्रह्मा ठाकुर त्यहि समया मा साँचो मरणहार दिखलाय ॥
गाँसी खटकति है मस्तक में कोखिन सेल्ल कटारी घाय १
बेला रानी त्यहि समया मा लै शिर तहाँ पहुँची जाय ॥
जहाँ चँदेला सुख शय्या मा करहत रहै बाण के घाय २
धरि शिर दीनह्यो तहँ ताहर को बोली हाथ जोरि शिरनाय ॥
कीनि आज्ञा पूरण स्वामी मारा समर आपनो भाय ३
सुनिकै बातैं ये बेला की देखन लाग चँदेलाराय ॥
जब शिर दीख्यो सो ताहरका तब मनमोद भयो अधिकाय ४
ब्रह्मा बोले फिरि बेला ते प्यारी साँच देयँ बतलाय ॥
मैके ससुरे सब सुख तुम्हरे चाहौ रहौ तहाँ तुम जाय ५
नहीं भरोसा अब जीवनका प्यारी प्राणरहे नगच्याय ॥
इतना कहिकै ब्रह्मा ठाकुर सुरपुर गयो तड़ाकाधाय ६
बेला गिरिकै रोवन लागी कारण करनलागि अधिकाय ॥
जो मैं जनतिउँ यह गति होई काहे हनति समर में भाय ७
हाय ! विधाताकी मर्जी यह हमरे बूत सही ना जाय ॥
चटक चूनरी ना मैली भै ना हम धरा सेज पै पाँय ८
खबरि पहुँकिगै यह महलन में रानी गिरीं भरहरा खाय ॥
हाहाकार परा मोहबे मा कोऊ रँधा भात ना खाय ६
ऊदन लाखनि दोऊ आये जहँपर मरा चँदेलाराय ॥
ने समुझायै भल बेलाको रानी शोक देउ विसराय १०