आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
DevanagariHindipublished618 पृष्ठ
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६४ आल्हखण्ड । ५४२
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
मालिक ललितेके तबलों तुम यशसों रहौ सदामरपूर १४२
माथ नवावों पितु माता को जिन बल पूरिभई यह गाथ ॥
करों तरंग यहाँ सों पूरण तवपदसुमिरि भवानीनाथ १४३
जो अभिलाषा मन हमरे है सो तुम पूरिकरो भगवन्त ॥
राम रमामिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १४४
इति श्रीलखनऊनिवासि(सी.आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण
जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पंडरीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव
बुधकृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृतबेलागौन आनयमैठाकुर
ब्रह्मासिंहघायल वर्णनोजनामप्रथमयुद्धेप्रथमस्तरंगः १ ॥
बेलाकेगौनेकाप्रथमयुद्धसमाप्त ॥
इति ॥