आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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बिपदा आई फिरि मोहबेमा फैली बात महल में जाय ॥
सुनी हकीकति रानी मल्हना महलन गिरी मूर्च्छाखाय ११८
बारह रानी चंदेले की रोवैं तहाँ पछारखाय ॥
ख्याति रोवैं घर अपने मां सपनेसरिसजगतदिखलाय ११९
साँचो स्वपना जग हम देखैं कोउन पूत पतोहू भाय ॥
आज मरैं दिन दूसर काल्ही याही साँच परै दिखलाय १२०
इयहिते भैया यहि दुनिया मा कबहुँन करै उपरको शीश ॥
सम्मत हमरो यह साँचा है नितप्रतिभजैरामजगदीश १२१
सोउन बाचा यहि दुनिया मा बाहू गये जासु के बीश ॥
सहसन बाहुनका अर्जुन भा ताकाहनावशिजगदीश १२२
काह हकीकति नरपामर की जो करिलेय उपर को शीश ॥
रहिगा ठाकुर ना सिरसा का कलियुगवीरधीरअवनीश १२३
ताते चाही नर देही को झुकि २ झुकतर झुकि जाय ॥
त्यों त्यों त्यों त्यों ऊपर जावै ज्यों २ शीश झुकावत जाय १२४
जैसे तरुवर है रसालको बौरन भार रहा गरुवाय ॥
ज्यों ज्यों बाढ़ फल रसालके त्योंत्योंझुकत २झुकिजाय १२५
ज्यों ज्यों पकिपकि टपकतआवैं त्यों त्यों डार उपरको जाय ॥
ऐसो सम्मत यह साँचा है साँचासमयगयोनगन्याय १२६
नहीं तो आल्हा को थाल्हाकरि ललिने धर्म देत दिखलाय ॥
काह हकीकति नर पामर की जोअभिमानकरतरहिजाय १२७
सुनी पाठ है जिन दुर्गा की खिन हना वीर समुदाय ॥
धर्म यथारथकी बातें सब अबकोस्वजनदेयदिखलाय १२८
ताते गाथा यह सब छूटा लूटा दुःख मोहोबा आय ॥
खबरि पहुँचीगै दथहरिपुरमा आल्हानिकटतड़ाका जाय १२६