आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० । आल्हखण्ड । ४७२
लिखी हकीकति जो मल्हनाने सो जगनायक दीन गहाय ॥
पढ़िकै चिट्ठी महरानी कै आल्हा चुपसाधि रहिजाय ९५
ऊदन बोले जगनायक ते भोजन हेतु चलौ सरदार ॥
आल्हा जावैं जो मोहबे को तो हम बैठि करें ज्यँवनार ९६
बारह दिनके अब अरसा मा लूटी नगर पिथौराराय ॥
ईजति रहै नहिं मल्हना की जो नहिं चलै बनाफरराय ९७
डोला लैहैं चन्द्रावलि का पारस पत्थर लिहैं छिड़ाये ॥
नहीं बनाफर सिरसा वाला जो गाढ़े मा होय सहाय ९८
नाहीं सुनिकै मलखाने की आल्हा छाँड़ि दीन डिंडकार ॥
ऊदन इन्दल देवा सय्यद रोवन लागि सबै सरदार ९९
बात फैलिगै यह महलन मा की मरिगये बीर मलखान ॥
को गति बरणै त्यहि समयैकै महलनछायो घोरमशान १००
द्यावलि सुनवाँ फुलवा रानी शिरधुनि बार बार पछिनायँ ॥
हाय ! बनाफर सिरसा वाले कैसे मरे समर में जाय १०१
सवैया ॥
हाय ! गयी सबमन्दिर छाय सुहाय नहीं ललिते सुख शय्या ।
बीर मेरे मलखान कुमार गई रणसों सब की मनसय्या ॥
हाय ! दयी बलवान सदा दुख औसुखको करि कर्म धवय्या ।
बीरबली मलखान समान जहाननहीं अस सोदर भय्या १०२
अस कहि रोवैं आल्हा ठाकुर दोऊ नैनन नीर बहाय ॥
बहु समुझायो जगनायक ने धीरज धरयो बनाफरराय १०३
अब नहिं जावैं हम मोहबे को तुमते साँच देयँ बतलाय ॥
खबरि जो पावत मलखाने की दिल्ली शहर लेत लुटवाय१०४