आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ आल्हखण्ड । १५३
काली जामुन काले मेघा नीचे ऊपर करें बहार १००
योगी पहुँचे मदनताल पर यारो सुनो कथा यहिवार ॥
चौंड़ा ठाढ़ो तट मल्हना के बकशी जौनुपिथौराक्यार १०१
कहन सँदेशा सो जब लाग्यो आयो देशराज के लाल ॥
धरिकै डाट्यो तहँ चौंड़ाका झगरा काह करें नरपाल १०२
कीनि प्रतिज्ञा हम रानी ते तुम्हरी पर्व व्याव करवाय ॥
काह हकीकति है पिरथी कै लूटैं मदनताल पर आय १०३
इतना सुनिकै ताहर जरिगे अपनी खैंचिलीन तलवार ॥
तब लखराना कनउज वाला सम्मुखभयो तुरत सरदार १०४
ताहर लाखनि का मुर्चा भा चौंड़ा मैनपुरी चौहान ॥
कोगति वरणै बघऊदन कै लागो करन खूब घमसान १०५
हौदा हौदा बेंदुल नाचैं ऊदन करें खूब तलवार ॥
बावनहौदा खाली हैगे जूझे हाथिन के असवार १०६
चोट लागिगै कछु धाँधू के सोऊ गिरे मूर्च्छाखाय ॥
सँभरिकै बैठे फिरि हौदा पर मनमाशोचिशोचिरहिजाय १०७
बड़े लड़ैया सब योगी हैं मुर्चा पूरे दीन जमाय ॥
अपने अपने सब मुर्चन मा ठकुरन दीन्ही राखिबढ़ाय १०८
ललातमोली धनुवाँ तेली सय्यद बनरस का सरदार ॥
लाखनि ऊदन देवाठाकुर रणमा खूब करें तलवार १०६
कोगति वरणै तहँ ताहर कै नाहर दिल्ली का सरदार ॥
चौंड़ा धाँधू कछु कमती ना येऊ करें भड़ाभड़ मार ११०
चलै सिरोही भल सागर में ऊना चलै विलाइति क्यार ॥
खट खट खट खट तेगा बोलै बोलै छपकछपक तलवार १११
झलझल् झलझल् छूरीचमकै चमकै रणमा खूब कटार ॥