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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 433

८ आल्हखण्ड । ४३२
साँचे योगी जनु पैदा भे पूरण योग परे दिखराय ॥
माथा चमकै भल ऊदन का नैननगई अरुणता छाय ६६
घढ़ा उतारू भुजदण्डै हैं सब विधि सुघर लहुरवाभाय ॥
नगर मोहोबा की गलियन में योगिन दीन्ह्यो धूममचाय ७०
रय्यति मोही परिमालिक की दीन्हेनि खानपान बिसराय ॥
भये बावला सँग योगिन के घूमन लागि नारिनर धाय ७१
रूप देखिकै लखराना का मोहीं युवा बाल तहँ आय ॥
अलख लाड़िला रतीभान का लाखनि शूरवीर अधिकाय ७२
नयन मिलावै नहिं नारिनसों नीचे शीशलेय औंधाय ॥
राग हिंडोला ऊदन गावै अँगुरिनभाव बतावत जाय ७३
मीरा ताल्हन बनरस वाला सो इकतारा रहा बजाय ॥
ताल स्वरन सों देवा ठाकुर खँझरी खूब रहा गमकाय ७४
खबरि पायकै मल्हना रानी योगिन महललीन बुलवाय ॥
चन्दन चौकिन माँ योगी सब बैठे रामचन्द्र को ध्याय ७५
मल्हना बोली तहँ योगिन ते साँचे हाल देउ बतलाय ॥
पूत पिथौरा के चारो तुम यह हम मनै लीन ठहराय ७६
लूटन आयो है महलन को सो यह मनै देउ बिसराय ॥
जियत न जैहौ तुम महलनते ब्रह्मारंजित लेउँ बुलाय ७७
मारि सिरोहिन ते हनिडरि हैं यमपुर अबै द्यहैं दिखलाय ॥
हाय ! बेंदुला का चढ़वैया नाहिंन आजु लहुरवाभाय ७८
सून पायकै पृथीराज ने गाँस्यो नगर मोहोबा आय ॥
पै अस खाली है मोहबा ना जस तुम मनैलीन ठहराय ७६
तिरिया लरि हैं रजपूतन की भाला बलछी साँग उठाय ॥
कुशल पिथौरा की हैहै ना तुम ते साँच दीन बतलाय ८०