आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ आल्हाखण्ड । ४१६
नचैं योगिनी खप्पर लीन्हे मज्जैं भूत प्रेत वैताल ४८
घोड़ी कबूतरी का चढ़वैया नाहर समरधनी मलखान ॥
सुमिरन करिकै शिवशंकर का मारिकै कीन खून खरिहान ४६
औ ललकारा रजपूतन का हमरे सुनो शूर सरदार ॥
जो कोउ पैदाहै दुनिया मा आखिर मरण होय इकवार ५०
परे खटोलिन में मरिहैहौ आखिर ह्वैहौ भूत परेत ॥
सम्मुख जूझै तलवारी के त्यहि बैकुण्ठ धाम हरि देत ५१
दिह्यो बढ़ावा बहु क्षत्रिनको नाहर सिरसा के सरदार ॥
पैदल पैदल इकमिल ह्वैगे औ असवार साथ असवार ५२
विकट लड़ाई क्षत्रिन कीन्ह्यो नदिया बही रक्तकी धार ॥
सूरति राजा हाड़ावाला मलखे सिरसा के सरदार ५३
दूनों अभिरे समरभूमि मा दूनों खूब करैं तलवार ॥
भाला बलछी दूनों मारैं दूनों लेयँ ढालपर वार ५४
सूरति गिरिगा जब संगर में अंगद शूर पहुँचा आय ॥
औ ललकारा मलखाने को तुम भगि जाउ बनाफरराय ५५
इतना कहिकै अंगद ठाकुर तुरतै मारा साँँग चलाय ॥
घोड़ी कबूतरी का चढ़वैया तुरतै लीन्ह्यो वार बचाय ५६
खैंचिकै मारा तलवारी का औ शिर दीन्ह्यो भूमि गिराय ॥
तीनि शूर पिरथी के जूझे हाहाकार शब्द गा छाय ५७
मुर्चा फिरिगे रजपूतन के काहू धीर धरा न जाय ॥
मलखे मारै दश पंद्राको घोड़ी देवै बीस गिराय ५८
दाँतन काटै टापन मारै अद्भुत समर कहा ना जाय ॥
हटा पिथौरा तब पाछे का आगे बढ़े बनाफरराय ५६
मलखे ताहर का मुर्चा भा मारैं एक एक को धाय ॥