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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 40

संयोगिनिस्वयम्बर । ३५
करन निराशा नहिं चाहत हैं मानो सत्य बचन कबिराज ॥
तुमहूं जावो निज मन्दिर को हमहूं जात आपनी राज ११६
यह सुनि गमने चन्द कवीश्वर जयचँद कूच दीन करवाय ॥
राति दिनौनन के धावा करि पहुँचेकनउजमेंफिरिआय १२०
पृथुइराज निज महलन पहुँचे पद्मिनि मिली तहांपर आय ॥
करि गन्धर्व ब्याह ताके सँग औसुखकरनलागिअधिकाय १२१
पूर स्वयम्बर संयोगिनि का गायों सत्य सत्य सब हाल ॥
माथ नवावों शिवशङ्करका अम्बुजसरिसनयनत्रयलाल १२२
किहे कोपिनी हैं सर्पन की धारे जटाजूट हैं शीश ॥
सकल जगत के सो स्वामी हैं किरपाकरें ललितपर ईश १२३
माथ नवावों पितु अपने को जिन म्वहिं विद्या दीन पढ़ाय ॥
आशिर्वाद देंव मुंशीसुत जीवहु प्रागनारायणभाय १२४
रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥
मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १२५
इति श्रीलखनऊनिवार्सि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज
बाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्त-
र्गत पँडरीकलांनिवासि मिश्रबंशोद्भवबुध कृपाशङ्कर
सूनु पण्डितललिताप्रसादकृत पृथुइराजजयचन्द
युद्धवर्णनो नाम तृतीयस्तरङ्गः ॥ ३ ॥
संयोगिनिस्वयंम्वरसम्पूर्ण ॥
इति ॥