आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 37, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ आल्हखण्ड ।
समय समइया की बातें हैं समया परै न बारम्बार ॥
समया परिगा राजा नलपर खूंटी हरा नौलखाहार ८५
रोज न मुर्चा कनउज ह्वैहै रोज न चढ़ी पिथौरा ज्वान ॥
मारो मारो ओ - रजपूतो सुनिकै बात हमारी कान ८६
इतनी सुनिकै सब क्षत्रिन ने अपनो मरण कीनअख्तयार ॥
भाला बरछी दोउ दल छूटे औफिरिचलनलागितलवार८७
धरिधरि धमकैंकड़ाबीन कोउ कोऊ मारैं खेंचि कटार ॥
बड़ी लड़ाई क्षत्रिन कीन्ह्यो नदिया बही रकतकीधार ८८
जैसे फागुन फगुई खेलैं तैसे लड़ैं वीर चौहान ॥
मुहँ नहिं फेरैं समरभूमि ते एकते एक वीर बलवान ८६
तबलौं डोला संयोगिनि को पहुँचा तीस कोसपर जाय ॥
रिसहा राजा कनउज वाला बहुतक क्षत्री डरा नशाय ९०
तबलौं डोला संयोगिनि को आइयो रतीभान तहँ जाय ॥
बहुतक क्षत्री घायल कैकै सो पृथीमाँ दीन खवाय ६१
कोगति वरणैं रतीभानकै हमरे बूत कही ना जाय ॥
फिरि फिरि मारै औ ललकारै रणमाँ घोड़ा रहानचाय ६२
रतीभान के तब मुर्चा में कोउ राजपूत न रोंकै पायँ ॥
सम्मुख आवै जो लड़ने को ताको मारै खेत खेलाय ६३
देखि लड़ाई रतीभान की हिरसिंह ठाकुर उठा रिसाय ॥
औ ललकारा रतीभान को ठाकुर खबरदार ह्वैजाय ६४
तबलौं डोला संयोगिनि को दिल्ली शहर पहुँचा जाय ॥
पाछे मारै औ ललकारै यहु महराज कनौजीराय ६५
तीर अनेकन पिरथी मारे लाखन डारे शूर नशाय ॥
बड़ा लड़ैया यहुतीरन में ज्यहिका कही पिथौराराय ६६