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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 339

२० आल्हखण्ड । ३३६
ता ता थेई ता ता थेई थिरकनलाग लहुरवाभाय ४६
टप्पा ठुमरी भजन रेखता धुर्पद सरंगीत कल्यान ॥
राग विहगरो जयजयवन्ती तूरै गजल पर्जपर तान ५०
कमर झुकावै भाव बनावै लाला देशराज का लाल ॥
रूप देखिकै तिन योगिन का अबलनसबलखड़ीतहँमाल ५१
कोऊ अँशिया पहिरति आवै जूरा कोऊ सँवारति बाल ॥
कोऊ दुश्ट्टा गलसों ओढै कोऊ चली मोरकी चाल ५२
कोऊ महाउर लिये हाथ में कोऊ चली छाँड़ि कै बाल ॥
कोऊ मेंहदी तजिकै दौरी बौरी भई तहाँपर बाल ५३
ऐसी बंशी प्यारी बाजै राजै ऊदन ओठ विशाल ॥
गाजै छाजै ध्वनि उपराजै लाजैं देखि देखि मनवाल ५४
हेला मेला अलबेला भा ठेला ठेल गैल में भाय ॥
कोऊ चमेला कोऊ बेलाका वारन तेल लगावत जाय ५५
बड़ी भीर भय गलियारन में कहूँ तिलडरा भूमि ना जाय ॥
नचै बँदुला का चढ़वैया आल्हा केर लहुरवा भाय ५६
दावति आयें नृप ड्योढ़ी को चागें रूप शील अधिकाय ॥
जायकै पहुँचे जब फाटकपर बाँदिन भीरभई अतिआय ५७
खबरि सुनाई रनिवासै में रानिन महलन लीनबुलाय ॥
झूठ लफोड़ा अस नाहीं थे जसकुछ आजपरै दिखलाय ५८
तबै जमाना कुछ साँचा था जाँचा चता भाग को जाय ॥
ब्राह्मण साधु न पर परतीती नीती यही सदाकी आय ५६
चलै अनीती तजि रीती जो ताको देश देय धिकार ॥
नृप अभिनन्दन के महलन में योगी पहुँचिगये त्यहिवार ६०
कहाँते आयो औ कहँ जैहौ अपनो हाल देउ बतलाय ॥