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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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१० आल्हखण्ड । २६९

दिन दश रहिकै तुम बौरी में पाछे विदा लिह्यो करवाय ६५
कबहूं आयो नहिं बौरी को नाहर उदयसिंह सरदार ॥
जायकै भेंटो अब बहिनी को इतनी मानो कही हमार ६६
इतना सुनिकै बघऊदन ने अपने साथ जुरावर लीन ॥
जाय बेंदुलापर चढ़िबौठा महलनगमन बेगिहीकीन ६७
आगे जुरावर पीछे ऊदन महलन बेगि पहुँचे जाय ॥
चरण लागिकै महरानी के ऊदन सामा दीन मँगाय ६८
देखैं सामा महरानी तहँ औरो नारिन लीन बुलाय ॥
देखिकै सामा चंदेले की सबके खुशीभई अधिकाय ६६
मटुका खुलिगे मेवावाले घर घर तुरत दीन बँटवाय ॥
दर दर गाथा चंदेले की घर घर रहे नारि नर गाय १००
यकटक देखें बघऊदन को क्षत्री बड़ा रँगीला ज्वान ॥
रूप देखिकै बघऊदन को नारिन छूटिगयो अरमान १०१
जिन नहिं देखा बघऊदन को तेऊ गईं तहाँपर आन ॥
जब मुख देखें बघऊदन को तब चुभि जाय करेजे वान १०२
बेटी प्यारी परिमालिक की भेंटी उदयसिंहको आय ॥
लाज समेटी बेटी भेंटी बैठा सकुचि बनाफरराय १०३
तवलों माहिल दाखिल हैगे औ दरबार पहुँचे आय ॥
किह्यो खातिरी वीरशाह ने अपने पास लीन बैठाय १०४
किह्यो बड़ाई जब ऊदन की माहिल ठाकुर सों महगज ॥
माहिल बोले महराजा ते आवत सुने हमारे लाज १०५
किह्यो प्रशंसा तुम ऊदन की जान्यो भेद नहीं महिपाल ॥
राज्यते बाहर इनको कीन्ह्यो क्रोधितभयो बहुतपरिमाल १०६
आल्हा रहिगे नैनागढ़ में ऊदन यहाँ पहुँचे आय ॥