आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ आल्हाखण्ड । २६०
ना मोहिं पठयो परिमालिक ने ना मोहिंमलहनादीनपठाय ७१
मनसे आई चन्द्रावलि को सावन मुहवा देउँ दिखाय ॥
राजा रानी की सम्मत ना अपने बूत चल्यनहममाय ७२
रीछ औ बाँदर सँगमा लैकै जीत्यो लङ्क राम महराज ॥
ग्वालनबालनयशुमति लालन लैकै हना कंस शिरताज ७३
छोटो अंकुश मानुष लैकै बैठै नित्त नाग शिर जाय ॥
जहँ मनभावै तहँ लैजावै तेजै सबल परै दिखलाय ७४
तेज न होई ज्यहि देही माँ सो लै करी फौज का माय ॥
दया धर्ममाँ कछु अन्तर ना मन्तर साँच देयं बतलाय ७५
धरम युधिष्ठिर का जाहिर है अधरम कौरौ गये नशाय ॥
लौटि बनाफर अब जाई ना बहुतनधजीधजीउड़िजाय ७६
इतना सुनिकै रानी अगमा मनमाँ ठीक लीन ठहराय ॥
क्यहु समुझायेते मानी ना साँचो । हठी बनाफरराय ७७
बहु धन दीन्ह्यो फिरि ऊदनको आशिर्वाद दीन हर्षाय ॥
पायँ लागिकै महरानी के ऊदन कूच दीन करवाय ७८
छाय उदासी गै महलन में तम्बुन अटा बनाफर आय ॥
कूच करायो फिरि बगिया ते औ बैरीगढ़ चला दबाय ७६
बारा दिनकी मैजलि करिकै बौरी पास पहुँचे आय ॥
एक कोस जब बौरी रहिगै ऊदन तम्बू दीन गड़ाय ८०
परा पलँगरा त्यहि तम्बू माँ तापर बैठ बनाफरराय ॥
लिखिकै चिट्ठी वीरशाहको धावन हाथ दीन पठवाय ८१
बैठक बैठे तहँ क्षत्री सब एकते एक शूर सरदार ॥
चिट्ठी लैकै धावन दीन्ह्यो आवन पढ़ा बनाफर क्यार ८२
बड़ी खुशाली वीरशाह करि जोरावरको लीन बुलाय ॥