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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

संयोगिनिस्वयंम्बर । २१
ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन बेद् उच्चार ८५
कूच के डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान॥
को गति बरणै त्यहि समया कै एकते एक सुघरूत्रा ज्वान ८६
हुकुम पाय कै कान्ह कुँवरको हिरासिंह कूच दीन करवाय ॥
आगे हलका भा हाथिन का पाछे चला रिसाला जाय ८७
चले सिपाही त्यहि पाछे सों एक सों एक दई के लाल ॥
खर खर खर खर कै रथ दौरैं रब्बा चलैं हवा की चाल ८८
जैसे नदियाँ चलैं समुंदर तैसे चली फौज त्यहि काल ॥
डगमग डगमग पृथ्वी हाली मारग बासी भये बिहाल ८६
शूर सिपाही ईजति वाले दहिनी धरैं मूछ पर हाथ॥
मनै मनावैं रामचन्द्र को बारम्बार नाय कै माथ ६०
कायर सोचैं यह मनमाँ सब लैके बड़ी बड़ी तहँ श्वास ॥
हम मरिइबे समरभूमि में होई वंश हमारो नाश ६१
हम भगिजावैं जो रस्ताते तोहू नहीं जीव की आश ॥
लौटि पिथौरा जब घर जैहै करिहै अवशिहमारो नाश ६२
कुंडलिया ॥
यारो सायर दशभले कायर भले न पचास ।
सायर रणसम्मुख लड़ैं कायरप्राण कि आश ॥
कायर प्राण कि आश भागि रणते द्वैआवैं ।
आपु हँसावहिं और कुटुंब को नाम धरावैं ॥
कहि गिरिधरकबिराय बातचारहुयुग जाहिर ।
सायर भलेहैं पांच संग सौ भले न कायर ६३
ऐसे कायर सब सोचत भे जिनकी कही कथा ना जाय ॥
परैं नगारन में चोटैं जब उनके होयँ करेजे घाय ९४