आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० आल्हखण्ड । २४८
लाव मलाई अब जल्दी सों दौरति चली बजारे जाय ६१
इतना सुनिकै हिरिया बोली साँची सुनो बनाफरराय ॥
हार छोड़िकै जाउँ बजारे तौ तकसीर बड़ी है जाय ६२
तनकिउ देरी हमका लागी फुलवा जाई बेगि रिसाय ॥
बातें सुनिकै ये हिरिया की बोले फेरि बनाफरराय ६३
हार तुम्हारो हम गूंथत हैं मालिनि जाउ बजरिया धाय ॥
पांच अशर्फी ऊदन दीन्ह्यो मालिनिचली तड़ाकाजाय६४
बेला चमेली औ निवारिको ऊदन हार कीन तय्यार ॥
मालिनि आई जब बजारेते देखा चार लरिनको हार ६५
हिरिया बोली तब ऊदन ते देवर मानो कही हमार ॥
हार डुलरिया रोज बनावों चौलर आज भयो तय्यार ६६
कर्री गांठि तुम्हारी की फूनन खूब सटा है यार ॥
हाल जो पूँछी फुलहर सें उत्तर काह देब सरदार ६७
बातें सुनिकै ये मालिन की बोला उदयसिंह त्यहिंवार ॥
बिटिया आई म्वरि बहिनी कै ताने हार कीन तय्यार ६८
इतनासुनिकै हिरियामालिनि तुरतै डलिया लीन उठाय ॥
जहँना बेटी रह नरपति कै मालिनि तहाँ पहुंची जाय ६६
बैठि पलँगरा फुलवा बेटी मालिनि हार दीन पहिराय ॥
चार लरिन को हरवा दीख्यो फुलवा बोलीवचनरिसाय १००
रोज डुलरिया लै आवति थी कौने गूँधा चौलरहार ॥
साँच बतावै री मालिनि अब नाहीं पेट फोरैहौं त्वार १०१
इतना सुनिकै मालिनि बोली दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥
बिटिया आई म्वरि बहिनी कै ताने हार बनायो आय १०२
वह तो ब्याही है मोहबे माँ जहँपर बसैं रजापरिमल ॥