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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 243

आलहखण्ड । २४०
लक्ष्मीपति तुमको सब जानत चाहन सरन आपनो काज ॥
भूप युधिष्ठिर की गति देखी वनमाँ रहे छूटिगै राज ४
वस्त्र न देखा जिन देहीमां केवल चढ़ी भस्म सब अङ्ग ॥
रावण बाणासुर को देखा जिन सों जुरी आपसौं जङ्ग ५
छूटि सुमिरनी गै देवन कै औ ऊदन का सुनो विवाह ॥
घोड़ खरीदन काबुल जैहैं पठई मोहवे का नरनाह ६
अथ कथाप्रसङ्ग ॥
एक समैया परिमालिक का भारी लाग राजदरबार ॥
बैठे क्षत्री सब महिफिल हैं एकने एक शूर सरदार १
पारस पत्थर ज्यहि के घरमा लोहा छुये सोन है जाय ॥
कौन बड़ाई तिनकै करिकै शोभा वरणि पार लै जाय २
माहिल शाले परिमालिक के सोऊ गये तहां पर आय ॥
देखि बनाफर उदयसिंह को माहिल पीर भई अधिकाय ३
माहिल बोले तहँ राजा सों मानो कही चँदेलेराय ॥
नाम तुम्हारो देश देश में तुम पर कृपा कीन रघुराय ४
एक बात की अब कमती है सो बिन कहे रहा ना जाये ॥
घोड़ तुम्हारे घर कमती हैं बूढ़े घोड़ भरे अधिकाय ५
रुपिया पैसा की कमती ना थोड़े घोड़ लेउ मँगवाय ॥
आवैं बछेड़ा काबुलवाले तौ फिरि नामहोय अधिकाय ६
इतना सुनिकै राजा बोले काबुल कौन खरीदन जाय ॥
हाथ जोरिकै ऊदन बोले काबुल हमें देउ पठवाय ७
सुनिकै बातैं बघ ऊदन की राजा गये सनाका खाय ॥
बोलि न आवा परिमालिक ते मुहँका विरागयो कुम्हिलाय ८
कलँगी गिरिगे फिरि पगड़ी ते काँपन लाग चँदेलेराय ॥