आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकैसे आयो तुम पथरीगढ़ हम को हाल देउ बतलाय ॥
बातें सुनिकै ये ऊदन की इन्दल यथातथ्य गा गाय १४४
गा हरिकारा पथरीगढ़ ते झुन्नागढ़ै पहुँचा जाय ॥
दीख तमाशा जो फौजन का राजै हाल दीन बतलाय १४५
सुनिकै बातें हरिकारा की सूरजमल का लीन बुलाय ॥
कही हकीकति सब सूरजते जल्दी हुकुमदीनफरमाय १४६
हुकुम पायकै महराजा को डंका तुरत दीन बजवाय ॥
हाथी घोड़ा औ रथ सजिगे पैदर सजे शूर समुदाय १४७
जितनी फौजें रहैं झुन्नागढ़ सबियाँ बेगि भई तय्यार ॥
हथी चढ़ैया हाथी चढ़िगे बांके घोड़न भे असवार १४८
'रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग ब्यवहार ॥
ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उच्चार १४६
कूचको डंका बाजन लाग्यो घूमन लाग्यो लाल निशान ॥
फौजै चलिकै झुन्नागढ़ ते पहुँचीं समरभूमि मैदान १५०
धूलि देखिकै आसमान में भारी देखि गर्द गुब्बार ॥
बोल्यो फौजन में त्यहि समया ठाकुर बेंदुलको असवार १५१
फौजै आईं गजराजाकी भारी अंधकार गा छाय ॥
जल्दी सजिकै ओ रणबाघो तुमहूं कूच देव करवाय १५२
बातें सुनिकै बघऊदन की सबियाँ फौज भई तय्यार ॥
झीलमबख्तर पहिरि सिपाहिन हाथ म लई ढाल तलवार १५३
पहिल नगाड़ा में जिनबंदी दुसरे फांदि भये असवार ॥
तिसर नगाड़ा के बाजत खन चलिभे सबै शूर सरदार १५४
पहिले मारुइ भई तोपन की दूसरि भई तीरकी मार ॥
तीसरि मारुइ बंदूकन की चौथे चलनलागितलवार १५५