आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमलखानका विवाह । १७५ १६
लाग घुमावन तब खंभा को क्षत्री गये सनाकाखाय ४६
लात मारिकै इक छत्री को ताकी लीन ढाल तलवार ॥
मलखे ठाकुर के मारुन में आँगन बही रक्तकी धार ५०
सिंह गरज्जनि मलखे गर्जे इत उत हनें बीर दश पांच ॥
जितने कायर रहें आँगन में देखत ढीलिहोइ तिन कांच ५१
फिरि फिरि मारै औ ललकारै नाहर समरधनी मलखान ॥
लरि लरि गिरिगे कितन्यो छत्री भारी लाग तहाँ खरिहान ५२
जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिडारै गाय ॥
तैसे मलखे के मुर्चा में कोउ राजपूत न रोके पायँ ५३
सूरज ठाकुर तहँ पाछे सों कम्मरपकरिलीन फिरिआय ॥
बहुतक छत्री यकमिल हैकै बन्धन फेरि लीन करवाय ५४
त्यालिया खंदक में गजराजा फिरि मलखे को दीन डराय ॥
हाल पायकै फुलिया मालिनि बेटी पास पहुंची जाय ५५
कही हकीकत सब मलखे की मालिनि बार बार तहँ गाय ॥
सुनिसुनिबातें तहँ मालिनिकी बेटी बार बार पछिताय ५६
तुम्हें विधाता अस चहिये ना जैसी कीन हमारे साथ ॥
बड़े दयालू औ बरदाता हमपर कृपाकरो रघुनाथ ५७
फिरि फिरि बिनवै रघुनन्दनको धरिकै भूमि आपनो माथ ॥
कैसे देखैं हम बालम को मालिनि फेरिकहौ यहगाथ ५८
सुनिकै बातें गजमोतिनिकी मालिनिकही कथा समुझाय ॥
दिवस बीतिगा इन बातन में संध्याकाल पहुंचा आय ५६
थार मँगायो तब चाँदी का भोजन सबै लीन धरवाय ॥
चाँदी केरे फिरि लोटा में निर्मल पानी लीन भराय ६०
पाँच पान को बीरा लैके रेशम रस्सी लीन मँगाय ॥