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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 177

९६ आल्हखण्ड । १७२
संग न देवै जो राजा का तौ हनिमरै काढ़ि तलवार १३ ।
ऐसे दीनन के मारे ते ऊदन जावै धर्म नशाय ॥
बड़ी कठिनता नर परिजावै औ परिजायँ जानपर आय १४
'ललिते दशरथ त्यहिसमयामाँ प्राणै दीन धर्म पर आय ॥
तैसे ऊदन कहा मानिकै धर्मै राखु दया पर आय १५
दया राखिकै इन नेगिन को सुखसों देव घरे पहुँचाय ॥
बड़ी दीनता इन नेगिन की सबकर गये प्राणघट आय १६
ऊदन ऐसे केहरि सम्मुख लरिकै कौन शूरमाँ जाय ॥
किह्यो बड़ाई बड़ भाई की आल्हा धर्म दीन समुझाय १७
ऊदन छाँड़यो तब नेगिन को नेगी घरे पहुंचे आय ॥
हाल बतायो गजराजा को सुनतै गयो सनाकाखाय १८
लिल्ली घोड़ी पर चढ़ बैठ्यो माहिल उरई को सरदार ॥
जायकै पहुँच्यो मुन्नागढ़माँ जहँपर भरी लाग दर्बार १६
बड़ी खातिरी भै माहिल कै राजा पास लीन बैठाय ॥
माहिल बोले वहि समया में ओ महराजा बात बनाय २०
शर्बत खन्दक में डारागा सबकै कुशल भई यहि ठाएँ ॥
लड़े बनाफर ते जितिहौ ना तुमते सत्य दीन बतलाय २१
अब चलि जावो यहि समयामें आल्हा निकट तुरत महराज ॥
हाथ जोरिकै पाँयन परिकै कीन्ह्योअवाशि आपनोकाज२१
बली भयेपर छल करिये ना निर्बल भये छलौ सों काज ॥
होय हँसौवा कन्या बेहे औ नहिं रहै जगतमें लाज २३
ऐसे समया में महराजा करिये कौन दूसरो साज ॥
छली न बाजैं हम दुनियाँ में औ रहिजाय हमारी लाज २४
छल बल राजाका कर्मै है कर्म न होय प्रजनकर भाय ॥