आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० आल्हखण्ड । १२६
स्वारथ देही तब नरकेही नेही मरे न पावै चाम ॥
सन्मुख जूझै समरभूमि में जावै तुरत हरी के धाम ९४
बड़े प्रतापी जग में जाहिर मनियाँदेव मोहोबे केर ॥
तिनके सेवक तेई रक्षक रूपन काह लगावो देर ९५
रूपन बोला तब मलखे ते दादा मानो कही हमार ॥
घोड़ करिलिया आल्हा वाला अपने हाथ देउ तलवार ९६
सुनिकै बातें ये रुपना की मलखे घोड़ दीन सजवाय ॥
ढाल खड्ग रुपना को दैके बैठे तुरत बनाफरराय ९७
बैठिकै रुपना फिरि घोड़े पर ऐपनावारी लीन उठाय ॥
चारिघरी को अरसा गुजरो नैनागढ़ै पहुँचो जाय ९८
देखिकै बारी दरवानी ने भारी हाँक दीन ललकार ॥
कहां ते आयो औ कहँ जैहौ बोलो घोड़े के असवार ६६
सुनिकै बातें द्वारपाल की रूपन बोला बचन उदार ॥
आल्हा ब्याहन को हम आये नामी मोहबे के सरदार १००
खबरि सुनावो नैपाली को फिरि तुम हमैं सुनावो आय ॥
ऐपनावारी बारी लायो ताको नेग देव पठवाय १०१
सुनिकै बोलो द्वारपाल फिरि तुम्हरो नेग काह है भाय ॥
सोऊ सुनावों महराजा को लादे लिहे घोड़ पर जाय १०२
सुनिकै बातें द्वारपाल की रूपन बोला बचन उदार ॥
चारिघरीभर चलै सिरोही द्वारे बहै रक्त की धार १०३
नेग हमारो यहु प्यारो है देवो पठै स्वईं सरदार ॥
जाहि पियारो तन होवै ना आवै स्वईं शूर अब द्वार १०४
सुनिकै बातें ये बारी की आरी द्वारपाल हैजाय ॥
मनमें सोचै मनै विचारै मनमें बार बार पछिताय १०५