आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ आल्हाखण्ड ।
सजि संयोगिनि गै पलमाँ इक बाँदियन हुकुम दीन फरमाय ॥
डोला लावो अब जल्दी सों बाँदिया चलीं हुकुमकोपाय ६४
लाई डोला सो जल्दी सों औ त्यहि खबरि सुनाई जाय॥
सुनिकै बातें सो बांदी की मनमें श्रीगणेशको ध्याय ६५
सुमिरि भवानी शिवशंकरको औ सूर्यन को माथ नवाय ॥
बैठी डोला में संयोगिनि सीता रामचरण मनलाय ६६
चारि कहरवा मिलिडोला लै तुरतै चले पूर्व दिशिधाय ॥
आगे डोला संयोगिनि को पांछे चलीं सहेली जाँय ६७
दौरति जावैं पुरवासी सब दासिन भीर भई अधिकाय ॥
चढ़िगे मंचन नर नारी सब राजन देखि देखि हर्षाय ६८
बड़ी भीर भय तब कनउज में औ तिल डरे भुईं ना जाय ॥
शोभा गावैं जो कनउज की तौफिरिएकसाल लगिजाय६६
डोला लैकै संयोगिनि का महरन तहाँ उतारा जाय ॥
जहँना बैठे सब राजा हैं एकते एक रूप अधिकाय ७०
उतरिकै डोला सों संयोगिनि माला दहिन हाथ लै लीन्ह ॥
सुमिरिभवानीसुत गणेश को महिफिलमध्यगमनतबकीन्ह७१
बैठे राजा सब महिफिल में एक ते एक शूर सरदार ॥
कोउ कोउ राजा तीस बरसका कोउ कोउ वर्ष अठारहकप्यार७२
काले नीले पीले लाले उजले शोभा के अधिकाय ॥
जामा पहिरे रेशमवाले चम्चम् चमकि २ रहिजाँय ७३
सोहैं दुपट्टा तिन जामन पर गल में परे मोतियन हार ॥
रंगाविरंगी पगड़ी शिर पर तिनपर कलँगी करै बहार ७४
हाथ लगाये हैं मुच्छन पर दहिने परी ढाल तलवार ॥
⁻ ० दिखावैं नहिं बैरी को ऐसे सबै शूर सरदार ७५