आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ आल्हखण्ड । १२०
अब तो बाबा कलियुग आये माता सहैं लात के घाय २३
सुनिकै बातें ये माता की सुनवाँ चरण शीश नवाय ॥
जो कछु भाषारहै सखियनने सुनवाँ मातै गई सुनाय २४
सुनिकै बातें सब कन्या की माता रही समय को देखि ॥
यकदिन ऐसा आनपहूँचा राजा रहा कन्यका पेखि २५
रानी बोली तब राजाते हमरे बचन करो परमान ॥
ब्याहन लायक यह कन्या भै सोतुमजानो नृपतिसुजान २६
सुनिकै बातें ये रानी की बिजिया बेटा लीन बुलाय ॥
नाई बारी को बुलवायो तिनते कह्योहालसमुझाय २७
जयो मोहोबे ना टीका लै सब कहुँ जाउ तुरतही धाये ॥
नाई बारी तुरतै चलिभे पहुँचे नगर नगर में जाय २८
काहू टीका को लीन्ह्यो ना. नैनागढ़ै पहुँचे आय ॥
खबरि सुनाई सब राजा को नेगिनचरणशीशनवाय २६
जालिम राजा नैनागढ़ का राजन यही विचारा जीय ॥
मारे डरके छाती धड़कै कैसेहोयँ तहांपर पीय ३०
थोरी थोरी फौजें लैके नैनागढ़ै पहुँचे आय ।
नजरी दीन्ह्यो नेपाली को राजाचरण शीशनवाय ३१
सरवरि तुम्हरी का नाहीं हैं टीका लेयँ कहौ कस भाय ।
कुमक तुम्हारी को आयन है राजन सत्यदीन बतलाय ३२
त्यही समैया त्यहि औसरमाँ औ सुनवाँ को सुनो हवाल ॥
हीरामणि सुवनाको लैके सुनवाँ भई रोवासिनिबाल ३३
चूम्यो चाट्यो त्यहि सुवनाको औफिरिकह्योबचन यहगाय ॥
मेवा खायो भल पिंजरन में अब गाढ़े में होउ सहाय ३४
लैके पाती जाउ मोहोबे देवो उदयसिंह को जाय ॥