आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 119, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ आल्हाखण्ड । ११४
लाखापातरि देशराज की सो बुलवई बीर मलखान १२६
संगै देवलि के पलकी त्यहि तहँ ते कूच दीन करवाय ॥
जौन सिपाही रहें महोबे के आल्हा तुरत लीन बुलवाय १२७
साल दुसाला काहू दीन्हो काहू कड़ा दीन डरवाय ॥
चौरा कलँगी दी काहू को काहू मोहर दीन छिदाय १२८
कूच कराये लोहागढ़ते बबुरीबनै पहुंचे आय ॥
जितनी सामारहै माड़ो की ताको ठीकठाक करवाय १२६
जितनो करिया लै आवा ता ताते दशगुन अधिक बढ़ाय ॥
आल्हा लैके हुशियारी सों बोले मातै शीश नवाय १३०
हुकुम जो पावैं महतारी को मलखे साथ बनारस जायँ ॥
चाचा दादा की किरिया करि पारैं पिण्ड गया में माय १३१
डरैं खुपड़ियाँ हम फलगू में तुमहूं कूच देव करवाय ॥
सुनिकै बातें ये आल्हा की माता बारबार बलिजाय १३२
स्यावसि स्यावसि सबदल बोल्यो भै मन बड़ेखुशी मलखाने ॥
पाँय लागिकै फिरि माता के तहँते चले दूनहू ज्वान १३३
ईतो पहुंचे हैं काशी में हाँ उन कूच दीन करवाय ॥
सत्रह दिनकी मैयाग परिकै सबदल अटा मोहोबे आय १३४
बाजै डंका ऊदन को बङ्का शङ्का को बिसराय ॥
कम्मर छोरैं कोउ कोउ क्षत्री कोऊ रहे रामको ध्याय १३५
सय्यद देवा ऊदन मिलिकै तीनों चले जहाँ परिमाल ॥
चरणन गिरिकै महाराजा के औसब कह्यो आपनो हाल १३६
तहँते उठिकै ऊदन चलिभे मल्हना महल पहुंचे जाय ॥
चरणन गिरिकै महरानी के अपना हाल गये सब गाय १३७
बड़ी खुशाली भै मल्हना के वरणी कौन भांति सो जाय ॥