आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ आल्हखण्ड । ११२
ठाढ़पिरायो नृप जम्बाको पाछे मूड़लीन कटवाय १०२
जहँ रहैं खुपड़ी देशराज की तहँ पर तुरतदीन टँगवाय ॥
तब रनबोले वहि समयामें स्याबसितुम्हेंउदयसिंहराय १०३
पूत सुपूते तुम अस होवैं नाही भलो गर्भ गिरि जाय ॥
पूत कपूते ज्यहि घर होवैं जरिजरिमरैंबाप औ माय १०४
पुरिखा रोवैं परे नरकमें नारी मरै जहर को खाय ॥
गली गली में भाई रोवैं करहत ज्ञाति परोसी जायँ १०५
पूत सुपुतिनि सिंहिनि माता निर्भय होय पूतको पाय ॥
गदही केरे दश बालक भे लादीअधिकअधिकसोजाय १०६
पूत सुपूता एक बंश में पालै जातिपांति को भाय ॥
जैसे बिरवा यक चन्दन को बनमाँ देय गंध फैलाय १०७
डाहु बुझान्यो अब जियरे को बैरी डारयो कल्हू पिराय ॥
लै कै खुपरी झरि काशी में किरियाकर्मकरो सबजाय १०८
इतना कहिकै रन झुप्पे भे आल्हा तुरत पहुंचे आय ॥
आल्हा बोले तहँ ऊदन ते लश्कर कूच देउ करवाय १०६
सुनिकै बातें ये आल्हा की रहिगे उदयसिंह शिरनाय ॥
खम्भ गड़ायो मलयागिरिको पंडित तुरतलीन बुलवाय ११०
भाँवरि घूमी तहँ ऊदन ने आल्हा बोले बचन रिसाय ॥
नहिं लैजैहैं यहि मोहवे हम मानो कही उदयसिंहराय १११
जबसुधिकरि है पितु अपनेकी मारी स्त्रवत लहुरवाभाय ॥
कन्या वैरी की ज्यहिके घर नाचै मृत्यु शीश पर आय ११२
त्यहिते मारौ तुम ऊदन यहि तौ सब काम सिद्ध ह्रैजायँ ॥
ऊदन बोले तब आल्हा ते दादा साँची देयँ बताय ११३
हम जो मारैं यहि तिरिया को तौ रजपूती जाय नशाय ॥