अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा
स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअकबर बीरबल विनोद १६०
जो काम मुझेही करना जरूरी है उसमें व्यर्थ आगा पीछा
करना उचित नहीं। मैं इस कार्य को आज ही सम्पादन
करूँगा। यह राजदरबार है। गुप्तचर बराबर लगे रहते हैं,
कहीं यह सुराख बेगमों को लग गई तो फिर काम होना
असम्भव हो जायगा। वे बादशाह को ऐसी गुप्त कोठरी में
छिपा देंगी कि वहाँ तक मेरा पहुँचना ही कठिन हो जायगा।
फिर एक कवि की ऐसी युक्ति भी है—
"काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
पल में परलय होयगो, बहुरि करोगे कब ॥"
गंग का ऐसा विचार करना झूठा नहीं था वह बेगमों के
नस नस से वाकिफ था, दूसरें स्त्रियों के भेद भावों का पूर्ण
ज्ञाता भी था। प्रातःकाल ही अपने कार्य साधन का निश्चित
कर जब अर्ध रात्रि का अमला आया तो अपनी पोशाक
बदल कर भयावनी सूरत बना ली। दिन मे ही एक काला
बुरका और एक हाथ भर की ऊँची काली टोपी सिलवा कर
दुरुस्त करवा लिये था। जब मध्य रात्रि आई तो बुरका और
टोपी को धारण कर हाथ में एक मोटा सा लट्ठ बाँध घर से
बाहर निकला। एक हाथ में माला भी लटक रही थी। उसने
अपनी सूरत राक्षस की बनाई थी। रास्ते में लोगों से
साक्षात्कार न हो जाय इस भय से हटता बढ़ता निर्धारित
स्थान की तरफ अग्रसर हुआ। जनाने बाग के द्वार पर पहुँच कर
आगा पीछा सोचने लगा। उसके मनमें यह समाई कि अगर
सदर फाटक से चलता हूँ तो निश्चय है कि पहरे वालों से
मुठभेड़ हो जायगी। अतएव गुप्तद्वार से चलने में ही कल्याण