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सर्वकोश
ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 108 में से

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पृष्ठ 90

८० ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय २
जन्मान्तरभावनापरिपाकवशादेषां | त्रितर्कका बोध कराता है—अनेक
देवानां वागग्न्यादीनां जनिमानि | जन्मान्तरोंकी भावनाके परिपाकवश
जन्मानि विश्वा विश्वानि सर्वा- | मैंने इन वाक् एवं अग्नि आदि देवताओं-
ण्यन्ववेदमहमहो अनुबुद्धवान- | के सम्पूर्ण जन्मोंका अनुभव-बोध
स्मीत्यर्थः । शतमनेका बह्व्यो मा | प्राप्त किया है । मुझे संसारबन्धनसे
मां पुर आयसीः आयस्यो लोह- | मुक्त होनेसे पूर्व आयसी अर्थात्
मय्य इवाभेद्यानि शरीराणीत्य- | लोहमयीके समान सैकड़ों-अनेकों
भिप्रायः, अरक्षन्नरक्षितवत्यः | अभेद्य पुरियों-शरीरोंने सुरक्षित (अव-
संसारपाशनिर्गमनादधः । अथ | रुद्ध) किया हुआ था । अब जालको
श्येन इव जालं भित्त्वा जवसा | काटकर वेगसे उड़ जानेवाले श्येन
आत्मज्ञानकृतसामर्थ्येन निरदीयं | (बाज पक्षी) के समान मैं आत्मज्ञान-
निर्गतोऽस्मि । अहो गर्भ एव | जनित सामर्थ्यके द्वारा उससे बाहर
शयानो वामदेव ऋषिरैवमुवा- | निकल आया हूँ—अहो ! वामदेव
चैतत् ॥ ५ ॥ | ऋषिने गर्भमें शयन करते हुए ही ऐसा कहा था ॥ ५ ॥
𑁍 𑁍 𑁍
'वामदेवकी गति
स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्व उत्क्रम्यामुष्मि-
न्त्स्वर्गे लोके सर्वान्कामानाप्त्वामृतः समभवत्समभवत् ॥६॥
वह [ वामदेव ऋषि ] ऐसा ज्ञान प्राप्तकर इस शरीरका नाश
होनेके अनन्तर उत्क्रमणकर इन्द्रियोंके अविषयभूत स्वर्ग ( स्वप्रकाश )
लोकमें सम्पूर्ण भोगोंको प्राप्तकर अमर हो गया, [अमर] हो गया ॥ ६॥
स वामदेव ऋषैर्यथोक्तमा- | वह वामदेव ऋषि पूर्वोक्त आत्मा-
त्मानमेवं विद्वानस्माच्छरीरभेदा- | को इस प्रकार जानकर इस शरीरका
च्छरीरस्याविद्यापरिकल्पितस्य | नाश होनेके अनन्तर अर्थात्
आयसवद्दुर्भेद्यस्य जननमकरणा- | लोहमयके समान दुर्भेद्य और जन्म-
द्यनेकानर्थशताविष्टशरीरप्रबन्धन- | मरणादि अनेक प्रकारके सैकड़ों अनर्थोंसे समन्वित इस अविद्यापरि-