ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
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अयमावसथ इत्युक्तानुकीर्त- | अयमावसथः [ ऐसा जो तीन
नमेव। तेषु ह्ययमावसथेषु पर्याये- | वार कहा गया है ] यह पूर्वकथित-
| का ही अनुकीर्तन है । उन
णात्मभावेन वर्तमानोऽविद्यया | आवसथोंमें क्रमशः आत्मभावसे
| रहनेवाला यह जीव दीर्घकालतक
दीर्घकालं गाढप्रसुप्तः स्वाभावि- | स्वाभाविक अविद्यासे गाढ निद्रामें
| सोता रहता है और अनेकों शत-
क्या न प्रबुध्यतेऽनेकशतसहस्रा- | सहस्र अनर्थोंकी प्राप्तिसे होनेवाले
| दुःखरूप मुद्गरोंके आघातके अनुभव-
नर्थसंनिपातजदुःखमुद्गराभिघा- | से भी नहीं जगता ॥ १२ ॥
तानुभवैरपि ॥१२॥ |
❧ जीवका मोह और उसकी निवृत्ति ❧
स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् किमिहान्यं वावदिष-
दिति । स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यत् । इदम-
दर्शमिती ३ ॥ १३ ॥
[ इस प्रकार शरीरमें प्रवेश करके जीवरूपसे ] उत्पन्न हुए उस
परमेश्वरने भूतोंको [ तादात्म्यभावसे ] ग्रहण किया । और [ गुरुकृपासे
बोध होनेपर ] 'यहाँ [ मेरे सिवा ] अन्य कौन है' ऐसा कहा । और
मैंने इसे ( अपने आत्मस्वरूपको ) देख लिया है इस प्रकार उसने इस
पुरुषको ही पूर्णतम ब्रह्मरूपसे देखा ॥ १३ ॥
स जातः शरीरे प्रविष्टो जी- | उसने उत्पन्न होकर—जीवभावसे
| शरीरमें प्रविष्ट होकर भूतोंको
वात्मना भूतान्यभिव्यैख्यद्व्या- | व्याकृत किया [ अर्थात् उन्हें
| तादात्म्यरूपसे ग्रहण किया ] । फिर
करोत् । स कदाचित्परमकारु- | किसी समय परम कारुणिक आचार्य-
| के द्वारा अपने कर्णमूलमें—जिसका
णिकेनाचार्येणात्मज्ञानप्रबोधकृ- | शब्द आत्मज्ञानका दृढ़ बोध कराने-