ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४ ऐतरेयोपनिषद् [ अध्याय १
तदेतदन्नं लोकलोकपालाना- | लोक और लोकपालोंके निमित्त
मर्थेऽभिमुखे सृष्टं तद्यथा मूष- | उनके सम्मुख निर्मित हुआ अन्न यह
कादिर्मार्जारादिगोचरे सन्मम | मानकर कि अन्न भक्षण करनेवाला तो
मृत्युरन्नाद इति मत्वा परागञ्च- | मेरी मृत्यु है, उसकी ओरसे मुख
तीति पराङ् सदृत्तन्तीत्याजि- | मोड़कर, जिस प्रकार बिलाव आदिके
घांसदतिगन्तुमैच्छत् पलायितुं | सामनेसे [उसे अपनी मृत्यु समझकर]
प्रारभतेत्यर्थः । | चूहे आदि भागना चाहते हैं उसी
तदन्नाभिप्रायं मत्वा स लोक- | प्रकार उन अन्न भक्षण करनेवालोंका
लोकपालसंघातः कार्यकारण- | अतिक्रमण करके जानेकी इच्छा
लक्षणः पिण्डः प्रथमजत्वाद् | करने लगा; अर्थात् उसने उनके
अन्यांश्चान्नादानपश्यंस्तदन्नं | सामनेसे दौड़ना आरम्भ कर दिया।
वाचा वदनव्यापारेणाजिघृक्षद् | अन्नके उस अभिप्रायको जान-
ग्रहीतुमैच्छत् । तदन्नं नाशक्नोन्न | कर लोक और लोकपालोंके देह-
समर्थोऽभवद्वाचा वदन- | इन्द्रियरूप संघात उस पिण्डने
क्रियया ग्रहीतुमुपादातुम् । | प्रथमोत्पन्न होनेके कारण अन्य
स प्रथमजः शरीरी यद्यदि | अन्नभोक्ताओंको न देखकर उस
हैनद्वाचाग्रहैष्यदगृहीतवान्त्स्याद- | अन्नको वाणी अर्थात् बोलनेकी
न्नं सर्वोऽपि लोकस्तत्कार्यभूतत्वा- | क्रियासे ग्रहण करना चाहा। किन्तु
दभिव्याहृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत्तृ- | वह वदनक्रियासे उस अन्नको ग्रहण
प्तोऽभविष्यत्, न चैतदस्ति; | करनेमें शक्त—समर्थ न हुआ।
| वह सबसे पहले उत्पन्न हुआ देह-
| धारी यदि इस अन्नको वाणीसे
| ग्रहण कर लेता तो उसका कार्यभूत
| होनेके कारण सम्पूर्ण लोक अन्नको
| बोलकर ही तृप्त हो जाया
| करता। परन्तु बात यह है नहीं,