ऐतरेयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Aitareya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 52, कुल 108 में से
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अन्नरचनाका विचार
स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः
सृजा इति ॥ १ ॥
उस (ईश्वर) ने विचारा ये लोक और लोकपाल तो हो गये
अब इनके लिये अन्न रचूँ ॥ १ ॥
स एवमीश्वर ईक्षत, कथम् ? | उस ईश्वरने इस प्रकार ईक्षण
| किया-किस प्रकार ? [सो
इमे नु लोकाश्च लोकपालाश्च | बतलाते हैं-] मैंने इन लोक और
| लोकपालोंकी रचना तो कर दी
मया सृष्टा अशनायापिपासाभ्यां | और इन्हें क्षुधा-पिपासासे संयुक्त
च संयोजिताः; अतो नैषां | भी कर दिया । अतः अन्नके बिना
स्थितिरन्नमन्तरेण।तस्मादन्नमेभ्यो | इनकी स्थिति नहीं हो सकती;
| इसलिये इन लोकपालोंके लिये मैं
लोकपालेभ्यः सृजै सृज इति । | अन्न रचूँ ।
एवं हि लोके ईश्वराणामनुग्रहे | इस प्रकार लोकमें ईश्वरों
| (समर्थों) की अपने लोगोंके ऊपर
निग्रहे च स्वातन्त्र्यं दृष्टं स्वेषु । | अनुग्रह एवं निग्रह करनेकी
तद्वन्महेश्वरस्यापि सर्वेश्वरत्वा- | स्वतन्त्रता देखी जाती है । इसी
| प्रकार सर्वेश्वर होनेके कारण महेश्वर
त्सर्वान्प्रति निग्रहानुग्रहेऽपि | (परमेश्वर) की भी सबके प्रति निग्रह
स्वातन्त्र्यमेव ॥ १ ॥ | एवं अनुग्रहमें स्वतन्त्रता ही है ॥ १ ॥