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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 592 में से

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३२ [ प्रथम पञ्चिका
दोहराता है जो उत्तम अर्थात् ऊपर का लोक है। इसीलिये यह
(द्यौ) इस (पृथ्वी) को वर्षा से सींचता है। और सुखाता है।
वह पांच देवतों के लिये अनुवाक्य और याज्य मंत्रों को बोलता
है। यज्ञ पांच-भाग वाला है। सब दिशाओं की कल्पना (सिद्ध)
हो जाती है और यज्ञ की भी कल्पना हो जाती है। उन पुरुषों
के लिये भी कल्पना हो जाती है जिनके पास इस रहस्य को
जानने वाला 'होता' होता है । (१)
८—जो तेज और ब्रह्मवर्चस् की कामना करे वह पूर्व की
ओर जाकर प्रयाज आहुतियों को देवे । पूर्व दिशा तेज ब्रह्मवर्चस्
है। जो इस रहस्य को समझ कर पूर्व दिशा की ओर जाकर
(प्रयाज आहुतियां) देता है वह तेजस्वी और ब्रह्मवर्चस्वी होता
है। जो अन्न आदि की इच्छा करे वह दक्षिण की ओर जाकर
के प्रयाज आहुतियां दें । अग्नि अन्न का खाने वाला और अन्न-
पति है। जो इस रहस्य को समझ कर दक्षिण की ओर जा करके
आहुति देता है वह अन्न का खाने वाला और अन्न-पति हो जाता
है और प्रजा और अन्न आदि से युक्त होता है। जो पशुओं
की कामना करे वह पश्चिम की ओर जा करके प्रयाज आहुतियों
को दे। ये जो जल हैं वह पशु हैं। जो इस रहस्य को समझ
कर पश्चिम की ओर जा करके (प्रयाज आहुतियां) देता है वह
पशु वाला होता है। जो सोमपान की कामना करे वह उत्तर की
ओर जाकर प्रयाज आहुतियाँ दे। उत्तर दिशा सोम है। जो इस
भेद को समझ कर उत्तर की ओर जाकर प्रयाज आहुतियां देता
है वह सोम पान को प्राप्त हो जाता है। ऊपर की दिशा स्वर्ग
वाली है। (जो ऊपर की दिशा में जाकर प्रयाज आहुतियां देता
है) वह सब दिशाओं को प्राप्त हो जाता है। यह सब लोक एक
दूसरे से सम्बद्ध हैं। जो इस रहस्य को समझता है उसके लिये
यह सब लोक श्री के लिये चमकते हैं। पथ्या के याज्य मंत्रों को