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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 592 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 303

पहला अध्याय ] .२८९
कुछ कहते हैं कि तीन अक्षरों से न्यूंख करना चाहिये ।
तीन लोक हैं और यह तीन लोकों की प्राप्ति के लिये किया
जाता है।
कुछ कहते हैं कि एक अक्षर का ही न्यूंख करे। मुद्गल
के पुत्र लांगलायन ब्राह्मण ने कहा कि वाग् में एक ही अक्षर
है इस लिये जो एक अक्षर से न्यूंख करता है वही ठीक
करता है।
कुछ कहते हैं कि दो अक्षरों से न्यूंख करे, प्रतिष्ठा के लिये।
मनुष्य के दो पैर हैं और पशु के चार । इस प्रकार वह मनुष्यों
को पशुओं में प्रतिष्ठित करता है। इस लिये दो अक्षरों से न्यूंख
करे। पहले प्रातरनुवाक में न्यूंख होता है। क्योंकि पशु पहले
मुँह से खाते हैं। इस प्रकार वह यजमान के मुँह को अन्न की
ओर फेर देता है।
आज्य शस्त्र में न्यूंख मध्य में किया जाता है। प्रजा अन्न
को बीच में लेती है। बीच में अन्न को यजमान में धारण
कराता है। दोपहर के सवन में न्यूंख आरंभ में किया जाता
है क्योंकि पशु मुँह से खाना खाते हैं। इस प्रकार वह यजमान
के मुँह को अन्न की ओर कर देता है। इस प्रकार दोनों सवनों
में अन्न की प्राप्ति के लिये न्यूंख* करता है। (३)
४-चौथे दिन का देवता वाग् है। स्तोम इक्कीसवां है।
वैराज साम है। अनुष्टुप् छन्द है। जो यह जानता है कि देवता
कौन है, स्तोम कौन है, साम कौन है और छन्द कौन है उसका
यज्ञ सफल होता है। 'आ' और 'प्र' चौथे दिन के रूप हैं। जो-
जो पहले दिन के रूप हैं वही चौथे दिन के, जैसे-युक्त, रथ,
आशु और पिब। पहले पद में देवता का स्पष्ट निर्देश है, और
*न्यूंख की विधि आश्वलायन श्रौतसूत्र (७।११) में लिखी है।
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