अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 825, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें७९८ * अग्निपुराण *
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आते हैं। स्थिरा, ध्रुवा और सालपर्णी-ये सरिवनके
नाम हैं। शृङ्गी, ऋषभ और वृष-ये काकड़ासिंगीके
वाचक हैं। (यह अष्टवर्गकी प्रसिद्ध ओषधि है)
गाङ्गेरुकी और नागबला-ये बलाके भेद हैं।
इन्हें हिंदीमें गुलसकरी और गंगेरन भी कहते हैं।
मुषली और तालमूलिका-ये मूसलीके नाम हैं।
ज्योत्स्नी, पटोलिका और जाली-ये तरोईके
अर्थमें आते हैं। अजशृङ्गी और विषाणी-ये
'मेडासिंगी' के वाचक हैं। लाङ्गलिकी और
अग्निशिखा-ये करियारीका बोध करानेवाले
हैं। ताम्बूली तथा नागवल्ली-ये ताम्बूल या
पानके नाम हैं। हरेणु, रेणिका और कौन्ती-ये
रेणुका नामक गन्धद्रव्यके वाचक हैं। हीबेरी और
दिव्यनागर-ये नेत्रबाला और सुगन्धबालाके नाम
हैं। कालानुसार्य, वृद्ध, अश्मपुष्प, शीतशिव और
शैलेय-ये शिलाजीतके वाचक हैं। तालपर्णी,
दैत्या, गन्ध, कुटी और मुरा-ये मुरा नामक
सुगन्धित द्रव्यका बोध करानेवाले हैं। ग्रन्थिपर्ण,
शुक और बर्हि (या बर्ह) - ये गठिवनके अर्थमें
आते हैं। बला, त्रिपुटा और त्रुटि-ये छोटी
इलायचीके वाचक हैं। शिवा और तामलकी-
ये भुईं आमलाके अर्थमें आते हैं। हनु और
हृद्विलासिनी-ये नखी नामक गन्धद्रव्यके बोधक
हैं। कुटन्नट, दाशपुर, वानेय और परिपेलव-ये
मोथाके नाम हैं। तपस्विनी तथा जटामांसी-ये
जटामाँसीके अर्थमें आते हैं। पृक्का (या स्पृक्का),
देवी, लता और लघु या (लशू) -ये 'असवर्ग'के
वाचक हैं। कर्पूरक और द्राविड़क-ये कर्पूरके
नाम हैं। गन्धमूली और शठी शब्द भी कचूरके
ही अर्थमें आते हैं। ऋक्षगन्धा, छगलान्त्रा, आवेगी
तथा वृद्धदारक-ये विधाराके नाम हैं। तुण्डिकेरी,
रक्तफला, बिम्बिका और पीलुपर्णी-ये कन्दूरीके
वाचक हैं। चाङ्गेरी, चुक्रिका और अम्बष्ठा-ये
अम्ललोड़िका (अम्लिलोना)-के बोधक हैं।
स्वर्णक्षीरी और हिमावती-ये मकोयके नाम हैं।
सहस्रवेधी, चुक्र, अम्लवेतस और शतवेधी-ये
अम्लबेंतके अर्थमें आते हैं। जीवन्ती, जीवनी
और जीवा-ये जीवन्तीके नाम हैं। भूमिनिम्ब
और किरातक-ये चिरात्तिक्त या चिरायताके
वाचक हैं। कूर्चशीर्ष और मधुरक-ये अष्टवर्गान्तक
'जीवक' नामक ओषधिके बोधक हैं। चन्द्र और
कपिवृक्क-ये समानार्थक शब्द हैं। (चन्द्रशब्द
कर्पूर और काम्पिल्य आदि अर्थोंमें आता है।)
दद्रुघ्न और एडगज-ये चकवड़ नामक वृक्षके
वाचक हैं। वर्षाभू और शोथहारिणी-ये गदहपुर्नाके
अर्थमें आते हैं। कुनन्दती, निकुम्भस्त्रा, यमानी
और वार्षिका-ये लताविशेषके वाचक हैं। लशुन,
गृञ्जन, अरिष्ट, महाकंद और रसोन-ये लहसुनके
नाम हैं। वाराही, वरदा (या वदरा) तथा गृष्टि-
ये वराहीकंदके वाचक हैं। काकमाची और
वायसी-ये समानार्थ शब्द हैं। शतपुष्पा, सितच्छत्रा,
अतिच्छत्रा, मधुरामिसि, अवाकपुष्पी और कारवी-
ये सौंफके नाम हैं। सरणा, प्रसारिणी, कटम्भरा
और भद्रवला-ये कुब्जप्रसारिणी नामक ओषधिके
वाचक हैं। कर्वूर और शटी-ये भी कचूरके
अर्थमें आते हैं। पटोल, कुलक, तिक्तक और
पटु-ये परवलके नाम हैं। कारवेल्ल और
कटिल्लक-ये करैलाके अर्थमें आते हैं। कूष्माण्डक
और कर्कारु-ये कोंहड़ाके वाचक हैं। उर्वारु
और कर्कटी-ये दोनों स्त्रीलिङ्ग शब्द ककड़ीके
वाचक हैं। इक्ष्वाकु तथा कटुतुम्बी-ये कड़वी
लौकीके बोधक हैं। विशाला और इन्द्रवारुणी-
ये इन्द्रायन (तूँबी) नामक लताके नाम हैं।
अर्शोघ्न, सूरण और कंद-ये सूरन या ओलके
वाचक हैं। मुस्तक और कुरुविन्द-ये दोनों
शब्द भी मोथाके अर्थमें आते हैं। त्वक्सार,