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अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 625

५९८ * अग्निपुराण *

ॐ ऐं नमः, अधरोष्ठे। ॐ ओं नमः, ऊर्ध्वदन्तपङ्क्तौ।
ॐ औं नमः, अधोदन्तपङ्क्तौ। ॐ अं नमः,
मूर्ध्नि। ॐ अः नमः, मुखवृत्ते। ॐ कं नमः,
दक्षिणबाहुमूले। ॐ खं नमः, दक्षिणकूर्परे।
ॐ गं नमः, दक्षिणमणिबन्धे। ॐ घं नमः,
दक्षिणहस्ताङ्गुलिमूले। ॐ ङं नमः, दक्षिण-
हस्ताङ्गुल्यग्रे। ॐ चं नमः, वामबाहुमूले। ॐ छं
नमः, वामकूर्परे। ॐ जं नमः, वाममणिबन्धे।
ॐ झं नमः, वामहस्ताङ्गुलिमूले। ॐ ञं नमः,
वामहस्ताङ्गुल्यग्रे। ॐ टं नमः, दक्षिणपादमूले।
ॐ ठं नमः, दक्षिणजानुनि। ॐ डं नमः,
दक्षिणगुल्फे। ॐ ढं नमः, दक्षिणपादाङ्गुलिमूले।
ॐ णं नमः, दक्षिणपादाङ्गुल्यग्रे। ॐ तं नमः,
वामपादमूले। ॐ थं नमः, वामजानुनि। ॐ दं
नमः, वामगुल्फे। ॐ धं नमः, वामपादाङ्गुलिमूले।
ॐ नं नमः, वामपादाङ्गुल्यग्रे। ॐ पं नमः,
दक्षिणपार्श्वे। ॐ फं नमः, वामपार्श्वे। ॐ बं
नमः, पृष्ठे। ॐ भं नमः, नाभौ। ॐ मं नमः,
उदरे। ॐ यं त्वगात्मने नमः, हृदि। ॐ रं
असृगात्मने नमः, दक्षांसे। ॐ लं मांसात्मने
नमः, ककुदि। ॐ वं मेदात्मने नमः, वामांसे।
ॐ शं अस्थ्यात्मने नमः, हृदयादि-दक्षहस्तान्तम्।
ॐ षं मज्जात्मने नमः, हृदयादि-वामहस्तान्तम्।
ॐ सं शुक्रात्मने नमः, हृदयादि-दक्षपादान्तम्।
ॐ हं आत्मने नमः, हृदयादिवामपादान्तम्।
ॐ लं परमात्मने नमः, जठरे। ॐ क्षं प्राणात्मने
नमः, मुखे।' इस प्रकार आदिमें 'प्रणव' और
अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर लिपीश्वरों-
मातृकेश्वरोंका न्यास किया जाता है॥ ३७-४०॥

श्रीकण्ठ, अनन्त, सूक्ष्म, त्रिमूर्ति, अमरेश्वर,
अर्धीश, भारभूति, तिथीश, स्थाणुक, हर, झिण्टीश,
भौतिक, सद्योजात, अनुग्रहेश्वर, अक्रूर तथा
महासेन—ये सोलह 'स्वर-मूर्तिदेवता' हैं। क्रोधीश,
चण्डीश, पञ्चान्तक, शिवोत्तम, एकरुद्र, कूर्म,
एकनेत्र, चतुरानन, अजेश, सर्वेश, सोमेश, लाङ्गलि,
दारुक, अर्द्धनारीश्वर, उमाकान्त, आषाढी, दण्डी
अद्रि, मीन, मेष, लोहित, शिखी, छगलाण्ड,
द्विरण्ड, महाकाल, कपाली, भुजङ्गेश, पिनाकी,
खड्गीश, बक, श्वेत, भृगु, नकुली, शिव
तथा संवर्तक—ये 'व्यञ्जन-मूर्तिदेवता' माने गये
हैं॥ ४१-४६॥

उपर्युक्त श्रीकण्ठ आदि रुद्रोंका उनकी
शक्तियोंसहित क्रमशः न्यास करे। (श्रीविद्यार्णव-
तन्त्रमें इनकी शक्तियोंके नाम इस प्रकार दिये गये
हैं—पूर्णोदरी, विरजा, शाल्मली, लोलाक्षी, वर्तुलाक्षी,
दीर्घघोणा, सुदीर्घमुखी, गोमुखी, दीर्घजिह्वा,
कुण्डोदरी, ऊर्ध्वकेशी, विकृतमुखी, ज्वालामुखी,
उल्कामुखी, श्रीमुखी तथा विद्यामुखी—ये रुद्रोंकी
'स्वर-शक्तियाँ' हैं। महाकाली, महासरस्वती,
सर्वसिद्धि, गौरी, त्रैलोक्यविद्या, मन्त्रशक्ति,
आत्मशक्ति, भूतमाता, लम्बोदरी, द्राविणी, नागरी,
खेचरी, मञ्जरी, रूपिणी, वीरिणी, काकोदरी,
पूतना भद्रकाली, योगिनी, शङ्खिनी, गर्जिनी,
कालरात्रि, कूर्दिनी, कपर्दिनी, वज्रिका, जया,
सुमुखी, रेवती, माधवी, वारुणी, वायवी,
रक्षोविदारिणी, सहजा, लक्ष्मी, व्यापिनी और
महामाया—ये 'व्यञ्जनस्वरूपा रुद्रशक्तियाँ' कही
गयी हैं।)

इनके न्यासकी विधि इस प्रकार है—'ह्सौं
अं श्रीकण्ठाय पूर्णोदर्यै नमः। ह्सौं आं अनन्ताय
विरजायै नमः।' इत्यादि। इसी तरह अन्य
स्वरशक्तियोंका न्यास करना चाहिये। व्यञ्जन-
शक्तियोंके न्यासके लिये यही विधि है।
यथा—'ह्सौं कं क्रोधीशाय महाकाल्यै नमः।
ह्सौं खं चण्डीशाय महासरस्वत्यै नमः।'
इत्यादि। साधकको चाहिये कि उदयादि अङ्गोंका
भी न्यास करे; क्योंकि सम्पूर्ण मन्त्र साङ्ग
होनेपर ही सिद्धिदायक होते हैं। हृल्लेखाको
व्योम-बीजसे युक्त करके इन अङ्गोंका न्यास
करना चाहिये। हृदयादि अङ्ग मन्त्रोंको अन्तमें