अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 509, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें४८२ * अग्निपुराण *
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हैं। क्षेपणी (गोफन आदि), धनुष एवं यन्त्र
आदिके द्वारा जो अस्त्र फेंका जाता है, उसे
'यन्त्रमुक्त' कहते हैं। (यन्त्रमुक्त अस्त्रका जहाँ
अधिक प्रयोग हो, वह युद्ध भी 'यन्त्रमुक्त' ही
कहलाता है।) प्रस्तरखण्ड और तोमर-यन्त्र आदिको
'पाणिमुक्त' कहा गया है। भाला आदि जो अस्त्र
शत्रुपर छोड़ा जाय और फिर उसे हाथमें ले
लिया जाय, उसे 'मुक्तसंधारित' समझना चाहिये।
खड्ग (तलवार आदि)-को 'अमुक्त' कहते हैं
और जिसमें अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग न करके मल्लोंकी
भाँति लड़ा जाय, उस युद्धको 'नियुद्ध' या 'बाहुयुद्ध'
कहते हैं॥ १-५॥
युद्धकी इच्छा रखनेवाला पुरुष श्रमको जीते
और योग्य पात्रोंका संग्रह करे। जिनमें धनुष-
बाणका प्रयोग हो, वे युद्ध श्रेष्ठ कहे गये हैं;
जिनमें भालोंकी मार हो, वे मध्यम कोटिके हैं।
जिनमें खड्गोंसे प्रहार किया जाय, वे निम्नश्रेणीके
युद्ध हैं और बाहुयुद्ध सबसे निकृष्ट कोटिके
अन्तर्गत हैं। धनुर्वेदमें क्षत्रिय और वैश्य-इन दो
वर्णोंका भी गुरु१ ब्राह्मण ही बताया गया है।
आपत्कालमें स्वयं शिक्षा लेकर शूद्रको भी
युद्धका अधिकार प्राप्त है। देश या राष्ट्रमें रहनेवाले
वर्णसंकरोंको भी युद्धमें राजाकी सहायता करनी
चाहिये२॥ ६-८॥
स्थान-वर्णन- अङ्गुष्ठ, गुल्फ, पाष्णिभाग और
पैर-ये एक साथ रहकर परस्पर सटे हुए हों तो
लक्षणके अनुसार इसे 'समपद' नामक स्थान३
कहते हैं। दोनों पैर बाह्य अङ्गुलियोंके बलपर
स्थित हों, दोनों घुटने स्तब्ध हों तथा दोनों
पैरोंके बीचका फैसला तीन बित्ता हो, तो यह
'वैशाख'नामक स्थान कहलाता है। जिसमें दोनों
घुटने हंसपंक्तिके आकारकी भाँति दिखायी देते
हों और दोनोंमें चार बित्तेका अन्तर हो, वह
'मण्डल' स्थान माना गया है। जिसमें दाहिनी
जाँघ और घुटना स्तब्ध (तना हुआ) हो और
दोनों पैरोंके बीचका विस्तार पाँच बित्तेका हो,
उसे 'आलीढ़'नामक स्थान कहा गया है। इसके
विपरीत जहाँ बायीं जाँघ और घुटना स्तब्ध हों
तथा दोनों पैरोंके बीचका विस्तार पाँच बित्ता हो,
वह 'प्रत्यालीढ़'नामक स्थान है। जहाँ बायाँ पैर
टेढ़ा और दाहिना सीधा हो तथा दोनों गुल्फ
और पाष्णिभाग पाँच अङ्गुलके अन्तरपर स्थित
हों तो यह बारह अङ्गुल बड़ा 'स्थानक' कहा
गया है। यदि बायें पैरका घुटना सीधा हो और
दाहिना पैर भलीभाँति फैलाया गया हो अथवा
दाहिना घुटना कुब्जाकार एवं निश्चल हो या
घुटनेके साथ ही दायाँ चरण दण्डाकार विशाल
दिखायी दे तो ऐसी स्थितिमें 'विकट'नामक
स्थान कहा गया है। इसमें दोनों पैरोंका अन्तर
दो हाथ बड़ा होता है। जिसमें दोनों घुटने दुहरे
१. 'गुरु' शब्दका अर्थ है-धनुर्वेदकी शिक्षा देनेवाला आचार्य। 'धनुर्वेदसंहिता'में सात प्रकारके युद्धोंका उल्लेख करके उन
सातोंके ज्ञाताको 'आचार्य' कहा गया है- 'आचार्यः सप्तयुद्धः स्यात्।' धनुष, चक्र, कुन्त, खड्ग, छुरिका, गदा और बाहु-इन सातोंसे
किये जानेवाले युद्धको ही 'सात प्रकारका युद्ध' कहते हैं।
२. 'वीरचिन्तामणि'के ६-७ श्लोकोंमें कहा गया है कि 'आचार्य ब्राह्मण शिष्यको धनुष, क्षत्रियको खड्ग, वैश्यको कुन्त (भाला)
और शूद्रको गदाकी शिक्षा प्रदान करे।' इससे भी सूचित होता है कि अस्त्र-विद्या और युद्धकी शिक्षा सभी वर्णके लोगोंको दी जाती
थी। अग्निपुराणके अनुसार वर्णसंकर भी इसकी शिक्षा पाते थे और युद्धमें राष्ट्रकी रक्षाके लिये राजाकी सहायता करते थे।
३. 'वीरचिन्तामणि' आदि ग्रन्थोंमें आठ प्रकारके 'स्थानों', पाँच प्रकारकी 'मुष्टियों' तथा पाँच तरहके 'व्याम' का वर्णन उपलब्ध
होता है। अग्निपुराणमें 'मुष्टि' और 'व्याम'के भेद नहीं हैं। अगले अध्यायके पाँचवें श्लोकमें 'सिंहकर्ण' नामक मुष्टिकी चर्चा अवश्य
की गयी है। परंतु स्थानके आठों भेदोंका लक्षणसहित वर्णन उपलब्ध होता है। इस वर्णनको देखते हुए 'स्थान' शब्दका अभिप्राय
योद्धाओंके युद्धस्थलमें खड़े होनेका ढंग जान पड़ता है। योद्धाओंको किस-किस ढंगसे खड़ा होना चाहिये और कौन-सा ढंग कब
उपयोगी होता है-इसीकी ओर इस प्रसङ्गमें संकेत किया गया है।