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सर्वकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 293, कुल 878 में से

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पृष्ठ 293

२६६ * अग्निपुराण *


एक सौ तेईसवाँ अध्याय

युद्धजयार्णव-सम्बन्धी विविध योगोंका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं—(अब स्वरके द्वारा विजय-साधन कह रहे हैं—) मैं इस पुराणके युद्धजयार्णव-प्रकरणमें विजय आदि शुभ कार्योंकी सिद्धिके लिये सार वस्तुओंको कहूँगा। जैसे अ,

स्थानमें ३ घटाया तो १०६२।४२ हुआ। (पुनर्गुणः) फिर भी इसके साथ गुणसंज्ञ (५३२।५१) का न्यास किया और जोड़ा तो—

१०६२।४२
५३२।५१
१०६२।५७४।५१हुआ। यहाँ तृतीय स्थानीय (५१) में ३० मिलाया तो—
३०
१०६२।५७४।८१हुआ। इसमें 'रसार्काष्टपलैर्युतः' के अनुसार (६।१२।८)
६।१२।८तीनों स्थानोंमें मिलाया
१०६८।५८६।८९हुआ। इसे ६० से तष्टित किया तो—
१०७७।४७।२९हुआ। यहाँ प्रथम स्थानमें २८ से भाग देकर शेष १३ को रखा तो
१३।४७।२९हुआ। इसमें पूर्वानीत तिथि-नाड़ी (३।३७।३६) को मिलाया तो
३।३७।३६
१७।२५।५यह भी सम्पन्नाङ्क हुआ अर्थात् दूसरा ऊर्ध्वाङ्क हुआ।

फिर गुणसंज्ञ (५३२।५१)-को आधा किया तो (२६६।२५) हुआ। दूसरे स्थानमें ३ घटाया तो (२६६।२२) हुआ। इसे दोसे गुणा किया तो (५३२।४४) हुआ। यहाँ (५३२) को ११ से गुणा किया और ४४ में १ मिलाया तो (५८५२।४५) हुआ। यहाँ (४५)-में ३९ से भाग देकर शेष ६ को अपने स्थानमें लिखा। लब्धिको प्रथम स्थानमें घटाया तो (५८५१।६) हुआ। प्रथम स्थानमें २२ घटाया तो (५८२९।६) हुआ। इसे ६० से तष्टित करके लब्धाङ्क (९७।९।६) हुआ। इसमें दूसरे ऊर्ध्वाङ्क (१७।२५।५)-को मिलाया तो (११४।३४।११) हुआ। प्रथम स्थानमें २७ से भाग देनेपर (६।३४।११) हुआ—यह नक्षत्र तथा योगका ध्रुवा हुआ।

व्यवस्थित शकादिमें तिथिका ध्रुवा (२।३२।००) यह है और नक्षत्र-ध्रुवा (२।१९।००) यह है, इसको प्रत्येक मासमें अपने-अपने मानमें जोड़ना चाहिये। जैसे कि पूर्वानीत तिथिके वारादि (३।३७।३६)-में तिथिका वारादि ध्रुवा (२।३२।००)-को मिलाया तो वैशाख शुक्ल प्रतिपदाका मान वारादि (६।९।३६) मध्यम मानसे हुआ एवं पूर्वानीत नक्षत्र-मान (६।३४।११)-में नक्षत्र-ध्रुवा (२।१९।००) को जोड़ा तो (८।४५।११) हुआ अर्थात् पुष्य नक्षत्रका मान मध्यम दण्डादि (४५।११) हुआ।

अब तिथि आदिका स्पष्ट मान जाननेके लिये संस्कार-विधि कह रहे हैं। इसे ११ वें श्लोकसे २० वें श्लोकतककी व्याख्याके अनुसार समझना चाहिये।

$$\begin{matrix}
& \text{ति.} & & & \
& \text{१४} & = & \text{०} & \
\text{ति.} & \text{ति.} & & \text{क्रमसे ऋण-धन} & \
\text{१३} & \text{१} & & = \text{५} & \text{अर्थात् त्रयोदशीके साधित} \
\text{१२} & \text{२} & ,, & = \text{१०} & \text{घटीमानमें ५ घटी ऋण} \
\text{११} & \text{३} & ,, & = \text{१५} & \text{और प्रतिपदाकी घटीमें ५} \
\text{१०} & \text{४} & ,, & = \text{१९} & \text{घटी अंशात्मक फल धन} \
\text{९} & \text{५} & ,, & = \text{२२} & \text{करना चाहिये।} \
\text{८} & \text{६} & ,, & = \text{२४} & \
& \text{७} & ,, & = \text{२५} &
\end{matrix}$$